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बुधवार, 24 मार्च 2021

इस मिशन के 1000 संत 400 आश्रम चलाते है भारत में

                                 गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी के में समझाया है




सतगुरु स्वामी समनदास महाराज जी का एक गुरु घर बन रहा है जो वर्ल्ड लेवल पर होगा ?
















                           गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी के में समझाया है 

कि एक हंस एक समुद्र से दूसरे समुद्र की ओर जा ही रहा था कि उसे एक कुआं दिखता है. 


वह बहुत थक चुका था ,उसने सोचा कि क्यों ना यहां पर बैठ कर आराम कर लिया जाए. जिस कुएं के किनारे वह बैठता है उसी कुएं के अंदर एक मेंढक रहता है .


 उस कुए के अंदर जो मेंढक था उस मेंढक ने हंस को देखकर पूछा:- " मित्र तुम कौन हो और कहां से आए हो” ?


 हंस ने कहा :- " मैं पक्षी हूं समुद्र किनारे रहता हूं और मोती चुन कर कर खाता हूं .


 समुद्र का नाम सुनते ही मेंढक के मन में सवाल आया कि समुद्र कितना बड़ा है ?

      

 हंस ने जवाब दिया ;- ' बहुत बड़ा हैं !


मेंढक* ने थोड़ी दूर पीछे हट कर कहा कि इतना बड़ा होगा?


हंस ने कहा:-” नहीं मित्र, इससे बहुत बड़ा|”


मेंढक ने बड़ा सा चक्कर लगाकर पूछा:-‘ इतना बड़ा?’


 हंस ने हंसकर कहा की समुद्र , तो कुए से भी कहीं गुना बड़ा होता है !


तब मेंढक बोला:-” तू झूठ बोल रहा है, बेईमान है| इससे बड़ा तो हो ही नहीं सकता |”


हंस ने सोचा कि इस मुर्ख मेंढक को समझाने से अच्छा है कि यहां से चला जाए और हंस वहां से अपने समुद्र की ओर चल दिया|


 गुरु रविदास जी ने पूरे भारत और विदेशों में पैदल घूम घूम कर जन जाग्रति फैलाई इसी कारण उनके अनुयाई पूरे भारत के अलावा अन्य कई देशों में भी पाए जाते हैं 


 मनुष्य को बहुत सरल तरीके से समझाया था ठीक यही हाल हमारे समाज का है क्युकी ये लोग कभी किसी की बात को नहीं मानते क्युकी ये अपनी उस व्यवस्था से कभी बाहर ही नहीं निकलना चाहते ।


समाज को दिन दुनिया का पता कैसे चले बस विरोधी भाषा का प्रयोग करते है कभी किसी महापुरुष संत गुरु की बताई भाषा का चिंतन मनन नहीं करते ।


सिक्ख धर्म 300 साल पहले ही बना है वे लोग अपने गुरुओं की बातो को सुनकर पढ़कर मानकर दुनिया में फैले ओर अपने गुरुओं का नाम रोशन किया ,


लेकिन हमारे #चमार समाज में हजारों महारथी संत गुरु महापुरुष आए और इन्हे समझा कर चले गए यदि ये उनकी बाते मान लेते तो ये जो आज भी अपने रोने रोते रहते है इन्हे रोने की जरूरत ना पड़ती :- अगर इस समाज ने अपने गुरुओं को माना होता तो आज दुनिया में इनका भी सम्मान होता ।


लेकिन कहने को हम सबसे ज्यादा लेकिन सबसे बिखरे हुए हमारे लोग :- कोई ईसाई बन गया कोई सिक्ख बन गया कोई मुसलमान तो कोई बौद्ध , धर्म परिवर्तन की दलदल में गिरते चले गए लेकिन कभी अपने पूर्वजों के दर्शन को नहीं समझा ,


आज भी हमारे समाज में गुरु रविदास जी के लाखो संत सत्संग के माध्यम से समाज में जागृति फैला रहे है । 

#पंजाब #हरियाणा #उत्तरप्रदेश #उत्तराखंड आदि राज्यो में गुरुओं के डेरे आश्रमों से मिशन संत मिशन चला रहे है गुरुओं की वणियो से प्रचार करते है ,ओर मानव मानव का भेद ख़तम करके एक अखंड समाज का निर्माण के रहे है हम सभी को उनका सहयोग करना चहिए ।


अखिल भारतीय संत शिरोमणि सतगुरु रविदास मिशन 

गुरु गद्दी शुक्रताल अध्यक्ष व संस्थापक सतगुरु स्वामी #समनदास जी महाराज ?


इस मिशन के 1000 संत 400 आश्रम चलाते है भारत में ओर गाव गाव में सत्संग की साखा लगाकर गुरु रविदास जी की मूल विचारधारा का प्रचार करते है निगुरे लोगो को गुरु मुखी बना रहे है और मांस मदिरा का त्याग करा कर शाकाहारी सदाचारी जीवन जीने का मूल मंत्र दे रहे हैं ,सत्संग और परमार्थ करा रहे है ।


यह सभी कार्यक्रम सतगुरु स्वामी #समनदास महाराज जी के अध्यक्षता में होते हैं ?

सतगुरु स्वामी समनदास महाराज जी का एक गुरु घर बन रहा है जो वर्ल्ड लेवल पर होगा ?


                                उत्तर प्रदेश जिला मुजफ्फरनगर सुक्र्ताल एतिहासिक नगरी 

                       आज के समय में आपके बीच युगपुरुष जीती जागती तस्वीर है 

हमारे देश भारत में बहुत बड़े बड़े महापुरुष हुए हैं दो संसार में अपना नाम चमका कर गए और आज संसार उनका गुणगान करता है आज के समय में आपके बीच युगपुरुष जीती जागती तस्वीर है जिनका नाम पूरे भारत में वह संसार में प्रचलित हो गया है उनका नाम संत शिरोमणि सतगुरु समनदास जी महाराज के नाम से प्रचलित है सतगुरु स्वामी समनदास जी महाराज का संसार इस जन्म सन 1922 को भादो पूर्णिमा को हुआ ग्राम लाख जिला मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश में हुआ था उनका बचपन का नाम हुकमचंद था पिता का नाम श्री फूल सिंह व माता का नाम लक्ष्मी देवी था यह लाख में अपना सादा जीवन निर्वाह कर रहे थे चमार जाति में इनका जन्म हुआ चित्र साल पहले 1926 के हालात चमारों का हाल आप से छिपा नहीं है इतिहास गवाह है कैसे रहते थे हुकम चंद जी अपने माता-पिता के साथ खेतों में काम करवाते थे और काश कार के यहां धूप में यह बरसात में सभी ऋतु में काम करना पढ़ता था क्योंकि किसान के यहां काम करना बड़ा कठिन है और मात्र एक यही काम था कि जिसको ज्यादातर हमारे लोग करते थे जिस समय हुकुमचंद e10 11 वर्ष के थे तब खेत में एक पेड़ के नीचे दोपहर में बैठे हुए थे और उन्हें उस समय संसार की वस्तुओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी वह सोचते रहते थे जैसे उन्हें कुछ प्राप्त करना हो इसी बीच उनके पास एक साधु आए और उन्होंने हुकुमचंद से पानी पीने के लिए मांगा तब हुकुमचंद बोले महाराज मैं चमार हूं मेरे हाथ से आप कैसे पानी पियोगे शादी बोले हुकुमचंद तुम कितने भोले हो तुम पानी पिलाओ हुकुमचंद जी घड़े में पानी लेकर आते हैं और सतगुरु समनदास जी महाराज पानी लेकर आते समय कुछ साधु को बड़े ध्यान से देखते हैं वह देखते हैं की एक ताकत पर बैठे और ताकत से नीचे तक उनके काले लंबे बाल लटक रहे हैं और चेहरे पर काले रंग की बड़ी-बड़ी दाढ़ी और चेहरे पर एक अजीब तेज चमक रहा है हुकम चंद जी ने देखा और हुकुम चंद जी मन ही मन में सोच रहे हैं यह सारी बातें कि इतनी धूप पड़ रही है और यह आसमान से कैसे नीचे आ गए यह जरूर कोई सिद्ध महात्मा है तब हुकुमचंद जी ने साधु को पानी पिलाया और पानी पीते पीते साधु महाराज से ज्ञान का उपदेश सुनाएं लगते हैं उनके अंदर ही सतगुरु अखंड ज्योति का स्वरूप दिखाया तभी से हुकुमचंद जी को अखंड ज्ञान हो गया जब मैं वहां से घर आए उन्हें संत की भांति ही बात कर रहे थे उन्होंने एकांत के लिए उपलों का धुना लगाया और धोना लगाकर कमरे में बैठ गए उनके घर वाले परेशान हो गए पिता फूल सिंह ने उन्हें काम करने को कहा परंतु हैं उनके भजन में मस्त है उन्होंने पिता फूल सिंह को विस्तार से समझाया परंतु मैं सोचने लगे कि इस पर किसी जादू टोने का असर हो गया है ऑपरेट प्रायर का मुझे लगता है उन्होंने एक सियाणा को बुलाया और उस सियाणा ने एक झाड़ू मंगाई और पिता फूल सिंह जी ने उसे झड़ लाकर दे दी वहां बहुत भीड़ हो गई लोग और काफी बच्चे पर औरतों भी थी और बहुत से डर के परेशान भी हो रहे थे कभी हुकुमचंद का पूरा हम पर ना आ जाए इसलिए लोग बाग डर भी रहे थे सियाणा ने जब झाड़ू को उठाया और उठाना चाहा चाहा तो सियाणा पर झाड़ू नहीं उठी और उसके हाथ आपस में चिपक गए उसने बहुत छुड़ाने की कोशिश की मगर उसके हाथ अपने हाथ से छूट नहीं रहे थे मानो किसी ने उसके हाथ रस्सी से जकड़ दिए हो दो दो आदमियों ने उसके हाथ छुड़ाने की कोशिश की मगर सियाणा हाथ नहीं छूटा सका तब सियाणा परेशान हो जाता है और महाराज जी से माफी मांगने लगते हैं कि है महाराज मुझे माफ कर दो आप जरूर कोई बड़ी शक्तियां तब हुकुम सिंह जी कहते हैं कि बता आज के बाद तो पागल नहीं बनाओगे लोगों का तब वह कहते हैं कि नहीं मैं पागल नहीं बनाऊंगा तब महाराज जी ने कहा खोल अपने हाथ तो उसने अपने आप को हाथ खोले और आप खुल गए सब सियाणा एक पल भी वहां नहीं रुका और भाग गया और इस बात का पर्चा पूरे गांव में आग की तरह फैल गया सभी को यह जानकारी हो गई की फूल सिंह के लड़के हुकुमचंद को कोई शक्ति मिल गई है तनु फूल सिंह जिस किसान के यहां लगे हुए थे वह किसान भी आता है और हुकम चंद जी को काम पर लौटने के लिए मनाने लगते हैं मगर हुकम चंद जी ने कहा कि मैं जिस काम के लिए आया हूं मुझे वह काम करना है तुम्हारा काम नहीं करना है इतनी बात सुनकर किसान को गुस्सा आ जाता है और वह फूल सिंह जी से कहते हैं कि तुम्हारा लड़का किसी काम का नहीं है और ना यह काम करेगा तुम मेरे ₹2000 दे दो बस मैं ऐसे काम पर नहीं ले जाता इतनी बात सुनकर हुकुमचंद जी बोले कि तुम अपनी चादर यहां बिचाओ मैं देता हूं तुम्हें पैसे तब हुकुम चंद जी ने जो उपले अपने धूणी मैं लगाए थे और उसके लाल लाल अंगारे हो रहे थे हुकुमचंद जी आग में से अंगारे निकाल निकाल कर उसकी चादर पर रखते गए और उनकी चादर पर रूपों का ढेर लग गया किसान यह करतब देख रहे थे सभी किसान को अपनी गलती पर पछतावा हुआ और वह हुकम चंद जी से माफी मांगने लगते हैं तब हुकुम संजू से कहते कि यह रुपया  लेऔर जाओ मगर किसान मगर किसान अपनी चादर और रुपए छोड़कर वहां से हाथ जोड़कर निकल जाते हैं हुकम चंद जी ने वह रुपए फिर वही रख दिया जहां से उन्होंने उठाता इस बात का चर्चा पूरे लाख गांव में जोर शोर से हो जाता हैl

        Abhay Das 

Deoband 9358190235



सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

एकलव्य कौन थे

 ।।सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य के अंगूठे का कत्ल।।



जब से भारतीय मूलनिवासी यूरेशियन के गुलाम हुए हैं, तभी से मूलभारतीयों, मूलनिवासियों और आदवंशियों के महापुरुषों को या तो कत्ल किया गया है या उन की विलक्षण प्रतिभा का भी नामो निशान मिटाया जाता आ रहा है। सम्राट शिव शंकर का मर्डर, शंबूक का कत्ल, रावण का छल से कत्ल, राजा बलि का हाथ बॉन्ध कर के कत्ल, एकलव्य की प्रतिभा का निशान मिटाने के लिए, उस के अंगूठे का कत्ल इतिहास आज तक भुला नहीं सका। 

एकलव्य कौन थे:---एकलव्य निषादराज का राजकुमार था, वनवासी तो तीर धनुष चलाने में, जन्मजात ही पारंगत होते हैं, फिर उन्हें कौन माई का लाल था, जो एकलव्य जैसे तीव्र बुद्धि के मालिक को तीर चलाना सीखा सकता था। वन में, एकलव्य धनुष चलाने का अभ्यास कर रहा था, जिसे द्रोणाचार्य का कुत्ता परेशान कर रहा था। एकलव्य ने, उस का मुंह तीरों से बन्द कर दिया था, जिसे देख कर द्रोणाचार्य सहित पांडव पुत्रों के होश उड़ गए थे, उन के पैरों तले मिट्टी खिसक गई, क्योंकि तीर कुत्ते के मुंह के अंदर घुस कर उस की जिह्वा को बंद कर बैठे थे, जैसा करना अर्जुन के वश का नहीं था। अर्जुन कुत्ते को देख कर, द्रोणाचार्य को गुस्से में कहने लगा, गुरु जी ! आप कहते थे कि आप से बड़ा कोई भी धनुर्धर नहीं होगा, कुत्ते को देख कर, आप को पसीना आ गया है, मेरे तो होश ही उड़ गए हैं, हम तो इन तीरों को देख कर ही, पशोपेश में पड़ गए हैं कि हमारा क्या होगा, हमारे पीछे तो पहले ही दुर्योदन पड़ा हुआ है।

द्रोणाचार्य ने, अर्जुन को ढाढस बंधाते हुए कहा, वत्स चिंता मत करो, जो हम करेंगे उस का आप को अनुमान नहीं है। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का ताज आप के ही मात्थे पर सजेगा। ये वनवासी आप के सामने आ ही नहीं सकेगा। देखते चलो हमारा चमत्कार। द्रोणाचार्य ने, अपनी ब्राह्मणवादी क्रूर चाल चली और अपनी मूर्ति बना कर, एकलव्य के अभ्यास स्थल पर स्थापित कर दी, दूसरे दिन द्रोणाचार्य भी अपने शिष्यों को लेकर, एकलव्य के शिक्षण स्थल पर पँहुच गया। छली द्रोणाचार्य ने एकलव्य को कहा, वत्स आप मेरी मूर्ति बना कर, मुझ से धनुर्धर विद्या सीख रहे हो, आप ने मुझे गुरु बना कर, मुझ से वीर धनुर्धर बनने का प्रयास किया है, तो फिर मुझे गुरु दक्षिणा क्यों नहीं देते हो ? एकलव्य ने द्रोणाचार्य को कहा, मैं कहाँ आप से धनुर्धर विद्या सीख रहा हूँ ? हम तो वनवासी लोग, आप लोगों से अधिक तीर चलाते हैं,हम आप से अधिक तीर चलाना जानते हैं, हम तो हररोज मार शिकार करते हैं, आप हमारे से मुकाबला कर के देख लो। क्रूर द्रोणाचार्य और पांडवों ने, जबरन एकलव्य को अकेला पा कर, उस का दहिने हाथ का अंगूठा काट दिया और प्रचारित कर दिया कि एकलव्य ने, स्वयं ही गुरु दक्षिणा में, अंगूठा काट कर देदिया। 

वास्तव में, मनुवादी हमेशा ऐसा ही छल करते आए हैं, वर्तमान में भी, मूलनिवासी, आदिवासी  प्रतिभासंपन्न युवाओं का भविष्य, इसी तरह ही समाप्त करते हैं। आज जितने बड़े बड़े पदों के लिए कंपीटीशन परीक्षाएं और प्रतियोगिताएं हो रही हैं, उन में मूलनिवासी युवा ही टॉप करते हैं, जिस के कारण ही, कांग्रेस और भाजपा आदि मनुवादी सरकारों ने, रोजगार देने के लिए ठेका प्रणाली शुरू कर रखी है ताकि ये ठेकेदार केवल मनुवादियों को ही नौकरियां दे कर, मूलनिवासी, मूलभारतीयों को बेकार रख सकें। मूलनिवासी राजनेताओं को, केवल एक ही राजनीतिक पार्टी बना कर, सत्ता छीनने का प्रयास करना चाहिए ताकि मूलनिवासी शासन स्थापित कर के न्याय पूर्वक भारतीयों को, एक समान अवसर उपलब्ध करवाए जा सकें।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।

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गुरु आदि परगास ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास जी महाराज,

 ।।पंजाब विधानसभा सन 1937 के सदस्य।।


सन 1936-1937 में गुलाम भारतवर्ष में पहले विधानसभा चुनाव चुनाव हुए थे, जिस में साहिबे कलाम मंगू राम जी ने, चुनाव लड़ कर आदधर्म का परचम सारे विश्व में, लहराया था। वे इसी चुनाव में अछूतों को आरक्षण लागू करवाने में भी सफल हो गए थे। भारतवर्ष का संविधान तो 1947 में बनना श्रु हुआ था और लागू 1950 में हुआ था, मगर ये महाउपलब्धि परमपूज्य साहिबे कलामें मंगू राम मुगोवाल जी, गुरु आदि परगास ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास जी महाराज, बीडीओ हजारा सिंह पिपलांवाला पंजाब और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज कानपुर उतर प्रदेश के


आंदोलनकारियों, प्रदर्शनकारियों की ही थी। पंजाब विधानसभा के 175 विधायकों के लिये चुनाव मार्च 1937 में हुए थे, जिन का विवरण निम्नलिखित है।


1 सर्व माननीय मेजर सरदार सर सिकन्दर हयात खान पश्चिम पंजाब।


2 सरदार बहादुर डॉक्टर सरदार सर सुंदर सिंह बटाला सिख ग्रामीण।


3 राव बहादुर चौधरी छोटू राम झझर सेंट्रल सामान्य ग्रामीण।


4 माननीय मिस्टर मनोहर लाल विश्वविद्यालय।


5 नबाबजादा मेजर मलिक खिजार हयात खान टिवाणा, खुशहाब मुहम्मदन ग्रामीण।


6 मियां अब्दुल हयात खान, दक्षिण पूर्व टाउन मोहम्मदन ग्रामीण।


7 श्रीमती रशीदा लातीफ, आंतरिक लाहौर मुहम्मदन स्त्री शहरी।


8 खान बहादुर नबाब मलिक अल्ला बख़्श खान , शाहपुर मुहम्मदन शहरी।


9 सरदार प्रताप सिंह, अमृतसर दक्षिण सिख ग्रामीण।


10 खान बहादुर नबाब मुजफ्फर खान, अटोक उतर, मुहम्मदन ग्रामीण।


11 सरदार मेजर मुहम्मद नबाज खान, अटोक सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


12 सरदार सोहन सिंह जोश, अमृतसर सिख ग्रामीण।


13 चौधरी सर सहाबुद्दीन, सियालकोट दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


14 डॉक्टर मुहम्मद आलम, रावलपिंडी डिवीजन टाउन मुहम्मदन शहरी।


15 डॉक्टर शेफुद्दीन किचलू, अमृतसर शहर, मुहम्मदन शहरी।


16 शेख फैज मुहम्मद, डेरा गाजी खान, सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


17 सरदार नरोत्तम सिंह, दक्षिण पूर्व पंजाब सिख ग्रामीण।


18 सरदार गोपाल सिंह, लुधियाना और फिरोजपुर सामान्य, आरक्षित सीट ग्रामीण।


19 चौधरी मुहम्मद यासीन खान, उतर पश्चिम गुड़गांव मुहम्मदन ग्रामीण।


20 राय साहिब चौधरी हेतराम, हिसार दक्षिण सामान्य, ग्रामीण।


21 श्री खालिद लतीफ गाऊबा, आंतरिक लाहौर, मुहम्मदन शहरी।


22 मलिक बरक़त अली, पूर्व टाउन मुहम्मदन शहरी।


23 मलिक हबीबुल्ला खान, सरगोदा मुहम्मदन ग्रामीण।


24 चाननसिंह, कसूर सिख ग्रामीण।


25 सरदार साहिब सरदार संतोख सिंह, पूर्व टाउन सिख शहरी।


26 सरदार कपूर सिंह, लुधियाना पूर्व सिख ग्रामीण।


27 चौधरी जल्लालूद्दीन अंबर, पश्चिम सेंट्रल पंजाब भारतीय क्रिश्चियन।


28 महंत प्रेम सिंह, गुजरात और शाहपुर सिख ग्रामीण।


29 सरदार मुजफ्फर अली खान, लाहौर मुहम्मदन ग्रामीण।


30 सरदार हरि सिंह, कांगड़ा और उत्तर होशियारपुर सिख ग्रामीण।


31 सरदार लालसिंह, लुधियाना सेंट्रल सिख ग्रामीण।


32 सरदार साहिब सरदार उज्जल सिंह, पश्चिम टाउन सिख शहरी।


33 डॉक्टर गोपी चन्द भार्गब, लाहौर शहर सामान्य शहरी।


34 प्रोफेसर डब्ल्यू रोबर्ट यूरोपियन।


35 लाला दुनी चन्द अंबाला और शिमला सामान्य ग्रामीण।


36 कैप्टन दीना नाथ, कांगड़ा दक्षिण सामान्य ग्रामीण।


37 मियां मुहम्मद इफ्तिखारूद्दीन, कौर मुहम्मदन ग्रामीण।


38 श्रीमती जहाँआरा शाह नबाज, आउटर लाहौर मुहम्मदन स्त्री शहरी।


39 लाला भीम सेन सच्चर, उतर पश्चिम टाउन सामान्य शहरी।


40 चौधरी कृष्णा गोपाल दत्त, उतर पूर्व टाउन सामान्य शहरी।


41 चौधरी टिक्का राम, रोहतक उतर सामान्य ग्रामीण।


42 शेख करामात अली, ननकाना साहिब मुहम्मदन ग्रामीण।


43 मास्टर काबुल सिंह, जालंधर पूर्व सिख ग्रामीण।


44 खान साहिब चौधरी रियासत अली, हफीजावाद मुहम्मदन ग्रामीण।


45 चौधरी मुहम्मद हसन,लुधियाना मुहम्मदन ग्रामीण।


46 राजा गजानफर अली खान, पिंड दादन खान मुहम्मदन ग्रामीण।


47 सरदार रूर सिंह, फिरोजपुर पूर्व सिख ग्रामीण।


48 चौधरी करतार सिंह, होशियारपुर पश्चिम।


49 टिक्का जगजीतसिंह बेदी, मुंटगुमरी पूर्व सिख ग्रामीण।


50 पंडित मुनी लाल कालिया, लुधियाना और फिरोजपुर सामान्य ग्रामीण।


51 नबाबजादा मुहम्मद फैज अली खान, करनाल मुहम्मदन ग्रामीण।


52 डॉक्टर संतराम सेठ, अमृतसर शहर सामान्य शहरी।


53 मखदूमजादा हाजी सियोद मोहम्मद रजा शाह जिल्लानी, सूजावाद मुहम्मदन ग्रामीण।


54 लाला सुदर्शन, पूर्वी टाउन सामान्य शहरी।


55 मौलवी गुलाम मौउद्दीन, शेखुपुरा मुहम्मदन ग्रामीण।


56 पंडित श्री राम शर्मा, दक्षिण टाउन सामान्य शहरी।


57 मीर मकबूल महमूद, अमृतसर मुहम्मदन ग्रामीण।


58 लाला भगत राम छोटा, जालंधर सामान्य ग्रामीण।


60 मिस्टर एस पी सिंघा, पूर्वी सेंट्रल पंजाब भारतीय क्रिश्चियन।


61 सरदार हरजाब सिंह, होशियारपुर दक्षिण सिख ग्रामीण।


62 श्रीमती रघुवीर कौर, अमृतसर सिख स्त्री।


63 सैयद अफजल अली हसन, शाहदरा मुहम्मदन ग्रामीण।


64 श्रीमती पार्वती जय चन्द, लाहौर शहर सामान्य स्त्री।


65 राय बहादुर मिस्टर मुकन्द लाल पुरी, रावलपिंडी डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


66 डॉक्टर सर गोकल चन्द नारंग, पश्चिम लाहौर डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


67 नबाब खान शाह नबाज खान, फिरोजपुर सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


68 नबाब सर मलिक मुहम्मद हयात खान नूर, उतर पंजाब।


69 खान बहादुर नबाब चौधरी फैजल अली, गुजरात पूर्वी मुहम्मदन ग्रामीण।


70 मियां अब्दुल अजीज, आउटर लाहौर मुहम्मदन शहरी।


71 सरदार दसौंदा सिंह, जगराओं सिख ग्रामीण।


72 खान बहादुर नबाब सर मुहम्मद जमाल खान, लेघारि, तुमानदार।


73 राय साहिब लाल गोपाल दास, कांगड़ा उतर सामान्य ग्रामीण।


74 मिस्टर सी राय, अमृतसर सियालकोट सामान्य ग्रामीण।


75 राव बहादुर कैपटन राव बलवीर सिंह, उतर पश्चिम गुड़गांव सामान्य ग्रामीण।


76 खान बहादुर मियां अहमद यार खान दौलताना मैलसी मुहम्मदन ग्रामीण।


77 चौधरी फकीर खान, तरनतारन मुहम्मदन ग्रामीण।


78 खान बहादुर मिंयाँ मुस्ताक अहमद गुरमानी, मुजफ्फरगढ़ उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


79 पीर अकबर अली शाह, फाजिलका  मुहम्मदन ग्रामीण।


80 सैयद मुबारक अली शाह, झांग सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


81 खान हैबत खान दाहा, खानेबाल मुहम्मदन ग्रामीण।


82 चौधरी साहिब दाद खान, हिसार मुहम्मदन ग्रामीण।


83 मियां नुरुल्ला, लायलपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


84 खुआजा गुलाम समंद, दक्षिण टाउन मुहम्मदन ग्रामीण।


85 राय बहादुर सरदार विशाखा सिंह, अमृतसर सेंट्रल सिख ग्रामीण।


86 भगत हंसराज, अमृतसर और सियालकोट सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


87 राय बहादुर बिंदा सारन, पंजाब कॉमर्स और उद्योग।


88 राय बहादुर लाला शाम लाल, पश्चिम मुल्तान डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


89 महंत गिरधारी दास, दक्षिण पूर्वी मुल्तान डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


90 सेठ राम नारायण अरोड़ा, लायलपुर और झांग सामान्य ग्रामीण।


91 ठाकुर रिपुदमन सिंह,गुरदासपुर सामान्य ग्रामीण। 


92 लाला शिव दयाल, दक्षिण पश्चिम टाउन सामान्य शहरी।


93 राय भगवंत सिंह, कांगड़ा पूर्व सामान्य ग्रामीण।


94 पीर मोयुद्दीन लाल बादशाह, अटोक दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


95 खान साहिब मिंयाँ नूर अहमद खान, दीपालपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


96 सैयद अमजद अली शाह, फिरोजपुर पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


97 चौधरी उमर हयात खान, भालबल मुहम्मदन ग्रामीण।


98 कैप्टन आशिक़ हुसैन, मुल्तान मुहम्मदन ग्रामीण।


99 खान साहिब राय शहादत खान, जारांवाला मुहम्मदन ग्रामीण।


100 खान बहादुर कैप्टन मलिक मुजफ्फर खान, मिंयाँवाली दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


101 खान साहिब चौधरी पीर मुहम्मद, दक्षिण पूर्व गुजरात मुहम्मदन ग्रामीण।


102 राजा मुहम्मद सरफ़राज़ खान, चकवाल मुहम्मदन ग्रामीण।


103 खान बहादुर मखदूम सैयद, मिझाम्मद हसन अलीपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


104 खान बहादुर सरदार मुहम्मद हसन खान गुरचानी, डेरा गाजीखान दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


105 सरदार उत्तम सिंह दुग्गल, उतर पश्चिम पंजाब सिख ग्रामीण।


106 सेठ किशन दास, जालंधर सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


107 लाला सीता राम, ट्रेड यूनियन लेबर।


108 दीवान चमन लाल, पूर्व पंजाब नान यूनियन पंजाब।


109 राय साहिब लाला आत्मा राम, हिसार उतर सामान्य ग्रामीण।


110 मौलवी मझार अली आझार, उतर पूर्वी टाउन मुहम्मदन शहरी।


111 पंडित भगत राम, कांगड़ा पश्चिम सामान्य ग्रामीण।


112 ख्वाजा गुलाम हुसैन, मुल्तान डिवीजन टाउन, मुहम्मदन शहरी।


113 खान साहिब चौधरी फजलद्दीन, अजनाला मुहम्मदन ग्रामीण।


114 चौधरी मुहम्मद अब्दुल रहमान खान, जालंधर उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


115 मिंयाँ फतेह मुहम्मद, गुजरात उतर, मुहम्मदन ग्रामीण।


116 मिंयाँ अहमद बख़्श खान, उतर पंजाब, नान यूनियन लेबर।


117 सरदार बलि मुहम्मद सियाल हिराज, कबीरवाला मुहम्मदन ग्रामीण।


118 चौधरी नसीरूद्दीन, गुजरांवाला उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


119 सूबेदार मेजर फरमान अली खान, गुजर खान मुहम्मदन ग्रामीण।


120 खान बहादुर राजा मुहम्मद अकरम खान, झेलम मुहम्मदन ग्रामीण।


121 खान साहिब नबाब मुहम्मद सादात अली खान, समूँद्री मुहम्मदन ग्रामीण।


122 चौधरी अली अकबर, गुरदासपुर पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


123 लियूटीनेंट सोढ़ी हरनाम सिंह, फिरोजपुर उतर सिख ग्रामीण।


124 खान साहिब चौधरी मुहम्मद सफी अली खान, रोहतक मुहम्मदन ग्रामीण।


125 सरदार अजीत सिंह, दक्षिण पश्चिम पंजाब सिख ग्रामीण।


126 चौधरी प्रेम सिंह, दक्षिण पूर्व गुड़गांव, सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


127 सरदार साहिब सरदार गुरबचन सिंह, जालंधर पश्चिम सिख ग्रामीण।


128 चौधरी अनन्त राम, करनाल दक्षिण सामान्य ग्रामीण।


129 चौधरी राम स्वरूप, रोहतक सेंट्रल सामान्य ग्रामीण।


130 सरदार मूला सिंह, होशियारपुर पश्चिम सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


131 मिंयाँ बद्दर मोयुद्दीन कादरी, बटाला मुहम्मदन ग्रामीण।


132 खान तालिब हुसैन खान, झांग पश्चिम मुहम्मदन ग्रामीण।


133 मखदूमजादा हाजी सैयद मुहम्मद बिलयात हुसैन जीलानी, लोधराम मुहम्मदन ग्रामीण।


134ख्वाजा गुलाम मुर्तज़ा, डेरा गाजीखान उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


135 मिंयाँ अब्दुल राब, जालंधर दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


136 चौधरी मुहम्मद हुसैन, गुजरांवाला पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


137 राणा नसरुल्ला खान, होशियारपुर पश्चिम मुहम्मदन ग्रामीण।


138 खान मुहम्मद यूसफ़ खान, रावलपिंडी सदर मुहम्मदन ग्रामीण।


139 सूफी अब्दुल हमीद खान, अंबाला और शिमला मुहम्मदन ग्रामीण।


140 पीर नसीरूद्दीन शाह, टोबा टेक सिंह मुहम्मदन ग्रामीण।


141 लाला हरनाम दास, लायलपुर और झांग सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


142 सरदार तारा सिंह, फिरोजपुर दक्षिण सिख ग्रामीण।


143 चौधरी जुगल किशोर, अंबाला और शिमला सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


144 सरदार प्रीतम सिंह, फिरोजपुर पश्चिम सिख ग्रामीण।


145 चौधरी फकीर चन्द, करनाल उतर सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


146 सरदार इंद्र सिंह, गुरदासपुर उतर सिख ग्रामीण।


147 राय हरि चन्द, ऊना सामान्य ग्रामीण।


148 लियूटीनेंट सरदार नौनिहाल सिंह मॉन, शेखुपुरा पश्चिम सिख ग्रामीण।


149 चौधरी रनपत, करनाल उतर सामान्य ग्रामीण।


150 राय फैज मुहम्मद खान, कांगड़ा और पूर्वी होशियारपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


151राजा फतेह खान, रावलपिंडी पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


152 चौधरी अब्दुल रहीम, शक्कर गढ़ मुहम्मदन ग्रामीण।


153 चौधरी मुहम्मद सरफ़राज़ खान, सियालकोट उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


154 चौधरी अहमद यार खान, उतर पश्चिम गुजरात मुहम्मदन ग्रामीण।


155 चौधरी गुलाम रसूल, सियालकोट सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


156 सरदार मुहम्मद हुसैन, चुनियन मुहम्मदन ग्रामीण।


157 चौधरी अब्दुल रहीम, दक्षिण पूर्वी गुड़गांव मुहम्मदन ग्रामीण।


158 मलिक फतेह शेर खान, मिंटगुमरी मुहम्मदन ग्रामीण।


159 खान साहिब गुलाम कादिर खान, मिंयाँवाली उटर मुहम्मदन ग्रामीण।


160 चौधरी जहांगीर खान, ओकरा मुहम्मदन ग्रामीण।


161 मिंयाँ फैजल करीम बख़्श, मुजफ्फरगढ़ सदर, मुहम्मदन ग्रामीण।


162 मिंयाँ सुल्तान महमूद हतियाना, पाक पाटन, मुहम्मदन ग्रामीण।


163 चौधरी मुहम्मद अशरफ, दक्षिण पश्चिम  गुजरात मुहम्मदन ग्रामीण।


164 सरदार बलवंत सिंह, सियालकोट सिख ग्रामीण।


165 चौधरी सुमेर सिंह, दक्षिण पूर्व गुड़गांव सामान्य ग्रामीण।


166 सरदार जोगिंद्र सिंह मॉन, गुजरांवाला और शाहदरा सिख ग्रामीण।


167 चौधरी सूरज मल, हांसी सामान्य ग्रामीण।


168 सरदार जगजीत सिंह मॉन, सेंट्रल पंजाब लैंड होल्डर।


सात व्यक्ति दो दो विधानसभाओं से चुने गए थे, जिन के खाली पड़े पद बाद में भरे गए थे

ABHEYDAS DeOBAND

                

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

भारतवर्ष कैसे सोने की चिड़िया कहलाता है।

 


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सबसे पहले भारत वर्ष का नाम जम्मू दीप था और आज जिसका नाम भारतवर्ष है वह एक टुकड़ा मात्र है जिसे आर्यवर्त भी कहते हैं जम्मू दीप में पहले देव असुर थे और बाद में कुरू वंश
और पूरू वंश लड़ाई मैं भारतवर्ष बहुत खंडों में बांटा आपस में झगड़े के कारण टुकड़ों में बट गया जम्मू दीप धरती के बीचो बीच है जम्मू दीप का विस्तार 100000 योजन है जम्मू दीप पर जामुन के अधिक पेड़ होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्मू  द्वीप पड़ा था इसमें छह पर्वत है.
1.प्लक्ष
2.शाल्मली
3.कुश
4. क्रॉच
5.शाक्य
6. पुष्कर
पुराणानुसार पृथ्वी के ये नौ खंड या ये विभाग, भारत, इलावृत्त, किंपुरुष, भद्र, केतुमाल, हरि, हिरण्य, रम्य और कुश।समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं 
मच्छेल।यवन की लड़ाई के कारण भारत जम्मू दीप में शरण दिए जाने लगे यहां हिंदू और जम्मू देवासी की आपस के मेल ना खाने और अपना हिंदुत्व को बढ़ावा देने से सभी आपस में अलग-अलग बट गए और फिर बौद्ध काल में यह मान सम्मान की लड़ाई अपने चरम सीमा पर पहुंच गई तब चाणक्य की बुद्धि से चंद्रगुप्त मौर्य की समझ से ज्ञान से भारतवर्ष का संपूर्ण विस्तार दोबारा से किया गया चंद्रगुप्त जी सभी को एक छत्र के नीचे लाने में सफल हुए इनके बाद सम्राट अशोक के बाद बृह्धृत को धोखे से मार कर उनसे सत्ता कब जाएगी और जितना भारत में धन था वह सब लूट लिया गया।
नोट,-अगर लेख में कोई त्रुटि हो तो उसे सही लिखकर भेजें
अभय दास देवबंद

सोमवार, 25 जनवरी 2021

सतगुरु समनदास ब्रह्मज्ञानी

                        सतनाम सतगुरु -


सतगुरु समनदास ब्रह्मज्ञानी अगमपुर के वासी पूर्ण अविनाशी।

धरती जब पाप के बोझ से कांपने लगती है, जलने लगती है मनुष्य ही मनुष्य को खाने लगता है मानवता खत्म हो जाती है दुनिया त्राहि-त्राहि मान हो जाती है डर ओर भय का खोप बढ जाता है तो उस समय उस अदृश्य शक्ति की याद आती है जो किसी ने न देखी ओर न पढ़ी हैं।

केवल बड़े बुजुर्गों के मुख से कहानी ओर किस्सो में सुनी है जिसे कुछ पढें लिखे लोग वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से देखना ओर पकड़ना चाहते हैं जो कि असम्भव है क्योंकि वह अदृश्य शक्ति तो भौतिक एवं रासायनिक उपकरणों से ही नही बल्कि मानुष दिमाग की सोच बुद्धि और कल्पना से भी बहुत दूर है।। ये मानुष ओर मानुष के उपकरण उसे कैसे पकड़ सकते है अभी तक तो मानुष ने मानुष की ही खोज नही की है कितने पुर्जे बाड़ी में लगे हुए हैं और कैसे लगे किस किस रसायन के लगे हैं। और चैलेंज करता है उस अदृश्य शक्ति के अस्तित्व को।

छोडिये इन बातों को मै बात कर रहा था जब धरती पाप के बोझ से कांपने लगती है अपना संतुलन खोने लगती है तो दुनिया में प्रलय ओर महाप्रलय तक भी आ जाती है, आकाश भी अंगार उगलने लगता है जिसके कारण मानव सभ्यता भी नष्ट हो जाती है।

उसी प्रलय ओर महाप्रलय को रोकने के लिए वो अदृश्य शक्ति संतो के रूप में प्रकृट होती है जो मनुष्य को सत्य का बौद्ध कराती है और असत्य से हटाकर पुरुषार्थ और भक्ति के मार्ग पर लगाती है जिस कारण धरती ओर धरती पर रहने वाले मनुष्यों का जीवन बच जाता है।

 उस अदृश्य शक्ति को संतो की भाषा में सतगुरु कहते हैं। समय के अनुसार आते हैं और चले जाते हैं जैसे - - सतगुरु रविदास जी महाराज, सतगुरु समनदास जी महाराज, चेतादास जो महाराज, अष्टावक्र,ऐसे बहुत सारे संतो का आवागमन हुआ है जिनके अंदर वो अदृश्य शक्ति विराजमान रही है उसको केवल महसूस किया जा सकता है न कि देख पाये या उसे छू पाये।

ताजा उदाहरण सतगुरु स्वामी समनदास जी महाराज रहे हैं जिनको जानना व पढ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। लेकिन वे हर किसी को पढ लेते थे। वे हमेशा लोक ओर परलोक की बात करते थे।

आगे की अगली पोस्ट में करेंगे।

सतनाम सतगुरु

(स्टार फिल्म स्टूडियो देवबंद )

अभय दास 9358190235








शुक्रवार, 22 मार्च 2019

क्रमांकजीवन परिचय बिंदुरविदास जी जीवन परिचय
1.पूरा नामगुरु रविदास जी
2.अन्य नामरैदास, रोहिदास, रूहिदास
3.जन्म1377 AD
4.जन्म स्थानवाराणसी, उत्तरप्रदेश
5.पिता का नामश्री संतोख दास जी
6.माता का नामश्रीमती कलसा देवी की
7.दादा का नामश्री कालू राम जी
8.दादी का नामश्रीमती लखपति जी
9.पत्नीश्रीमती लोना जी
10.बेटाविजय दास जी
11.मृत्यु1540 AD (वाराणसी)
गुरु रविदास जी का जन्म वाराणसी के पास सीर गोबर्धनगाँव में हुआ था. इनकी माता कलसा देवी एवं पिता संतोख दास जी थे. रविदास जी के जन्म पर सबकी अपनी अपनी राय है, कुछ लोगों का मानना है इनका जन्म 1376-77 के आस पास हुआ था, कुछ कहते है 1399 CE. कुछ दस्तावेजों के अनुसार रविदास जी ने 1450 से 1520 के बीच अपना जीवन धरती में बिताया था. इनके जन्म स्थान को अब ‘श्री गुरु रविदास जन्म स्थान’ कहा जाता है.
रविदास जी के पिता राजा नगर राज्य में सरपंच हुआ करते थे. इनका जूते बनाने और सुधारने का काम हुआ करता था. रविदास जी के पिता मरे हुए जानवरों की खाल निकालकर उससे चमड़ा बनाते और फिर उसकी चप्पल बनाते थे. 
रविदास जी बचपन से ही बहुत बहादुर और भगवान् को बहुत मानने वाले थे. रविदास जी को बचपन से ही उच्च कुल वालों की हीन भावना का शिकार होना पड़ा था, वे लोग हमेशा इस बालक के मन में उसके उच्च कुल के न होने की बात डालते रहते थे. रविदास जी ने समाज को बदलने के लिए अपनी कलम का सहारा लिया, वे अपनी रचनाओं के द्वारा जीवन के बारे में लोगों को समझाते. लोगों को शिक्षा देते कि इन्सान को बिना किसी भेदभाव के अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना चाहिए.
रविदास जी की शिक्षा (Sant Ravidas education) 
बचपन में रविदास जी अपने गुरु पंडित शारदा नन्द की पाठशाला में शिक्षा लेने जाया करते थे. कुछ समय बाद ऊँची जाति वालों ने उनका पाठशाला में आना बंद करवा दिया था. पंडित शारदा नन्द जी ने रविदास जी की प्रतिभा को जान लिया था, वे समाज की उंच नीच बातों को नहीं मानते थे, उनका मानना था कि रविदास भगवान द्वारा भेजा हुआ एक बच्चा है. जिसके बाद पंडित शारदा नन्द जी ने रविदास जी को अपनी पर्सनल पाठशाला में शिक्षा देना शुरू कर दिया. वे एक बहुत प्रतिभाशाली और होनहार छात्र थे, उनके गुरु जितना उन्हें पढ़ाते थे, उससे ज्यादा वे अपनी समझ से शिक्षा गृहण कर लेते थे. पंडित शारदा नन्द जी रविदास जी से बहुत प्रभावित रहते थे, उनके आचरण और प्रतिभा को देख वे सोचा करते थे, कि रविदास एक अच्छा आध्यात्मिक गुरु और महान समाज सुधारक बनेगा.
रविदास जी के साथ पाठशाला में पंडित शारदा नन्द जी का बेटा भी पढ़ता था, वे दोनों अच्छे मित्र थे. एक बार वे दोनों छुपन छुपाई का खेल रहे थे, 1-2 बार खेलने के बाद रात हो गई, जिससे उन लोगों ने अगले दिन खेलने की बात कही. दुसरे दिन सुबह रविदास जी खेलने पहुँचते है, लेकिन वो मित्र नहीं आता है. तब वो उसके घर जाते है, वहां जाकर पता चलता है कि रात को उसके मित्र की मृत्यु हो गई है. ये सुन रविदास सुन्न पड़ जाते है, तब उनके गुरु शारदा नन्द जी उन्हें मृत मित्र के पास ले जाते है. रविदास जी को बचपन से ही अलौकिक शक्तियां मिली हुई थी, वे अपने मित्र से कहते है कि ये सोने का समय नहीं है, उठो और मेरे साथ खेलो. ये सुनते ही उनका मृत दोस्त खड़ा हो जाता है. ये देख वहां मौजूद हर कोई अचंभित हो जाते है.
संत रविदास का आगे का जीवन (Sant Ravidas life history) 
रविदास जी जैसे जैसे बड़े होते जाते है, भगवान राम के रूप के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती जाती है. वे हमेशा राम, रघुनाथ, राजाराम चन्द्र, कृष्णा, हरी, गोविन्द आदि शब्द उपयोग करते थे, जिससे उनकी धार्मिक होने का प्रमाण मिलता था.
रविदास जी मीरा बाई के धार्मिक गुरु हुआ करते थे. मीरा बाई राजस्थान के राजा की बेटी और चित्तोर की रानी थी. वे रविदास जी की शिक्षा से बहुत अधिक प्रभावित थी और वे उनकी एक बड़ी अनुयायी बन गई थी. मीरा बाई ने अपने गुरु के सम्मान में कुछ पक्तियां भी लिखी थी, जैसे – ‘गुरु मिलया रविदास जी..’ मीरा बाई अपने माँ बाप की एकलौती संतान थी, बचपन में इनकी माता के देहांत के बाद इनके दादा ‘दुदा जी’ ने इनको संभाला था. दुदा जी रविदास जी के बड़े अनुयाई थे, मीरा बाई अपने दादा जी के साथ हमेशा रविदास जी से मिलती रहती थी. जहाँ वे उनकी शिक्षा से बहुत प्रभावित हुई. शादी के बाद मीरा बाई ने अपनी परिवार की रजामंदी से रविदास जी को अपना गुरु बना लिया था.मीरा बाई जीवन परिचय दोहे रचनाएँ यहाँ पढ़ें.
मीरा बाई अपनी रचनाओं में लिखती है, उन्हें कई बार मृत्यु से उनके गुरु रविदास जी ने बचाया थालोगों का कहना है, भगवान् ने धर्म की रक्षा के लिए रविदास जी को धरती में भेजा था, क्यूंकि इस समय पाप बहुत बढ़ गया था, लोग धर्म के नाम पर जाति, रंगभेद  करते थे. रविदास जी ने बहादुरी से सभी भेदभाव का सामना किया और विश्वास एवं जाति की सच्ची परिभाषा लोगों को समझाई. वे लोगों को समझाते थे कि इन्सान जाति, धर्म या भगवान् पर विश्वास के द्वारा नहीं जाना जाता है, बल्कि वो अपने कर्मो के द्वारा पहचाना जाता है. रविदास जी ने समाज में फैले छुआछूत के प्रचलन को भी ख़त्म करने के बहुत प्रयास किये. उस समय नीची जाति वालों को बहुत नाकारा जाता था. उनका मंदिर में पूजा करना, स्कूल में पढाई करना, गाँव में दिन के समय निकलना  पूरी तरह वर्जित था, यहाँ तक कि उन्हें गाव में पक्के मकान की जगह कच्चे झोपड़े में ही रहने को मजबूर किया जाता था. समाज की ये दुर्दशा देख रविदास जी ने समाज से छुआछूत, भेदभाव को दूर करने की ठानी और समान के लोगों को सही सन्देश देना शुरू किया.

रविदास जी लोगों को सन्देश देते थे कि ‘भगवान् ने इन्सान को बनाया है, न की इन्सान ने भगवान् को’ इसका मतलब है, हर इन्सान भगवान द्वारा बनाया गया है और सबको धरती में समान अधिकार है. संत गुरु रविदास जी  सार्वभौमिक भाईचारे और सहिष्णुता के बारे में लोगों को विभिन्न शिक्षायें दिया करते थे.
रविदास जी द्वारा लिखे गए पद, धार्मिक गाने एवं अन्य रचनाओं को सिख शास्त्र ‘गुरु गोविन्द ग्रन्थ साहिब’ में शामिल किया गया है. पांचवे सिख गुरु ‘अर्जन देव’ ने इसे ग्रन्थ में शामिल किया था. गुरु रविदास जी की शिक्षाओं के अनुयायियों को ‘रविदास्सिया’ और उनके उपदेशों के संग्रह को ‘रविदास्सिया पंथ’ कहते है.
रविदास दास जी का स्वाभाव –
रविदास जी को उनकी जाति वाले भी आगे बढ़ने से रोकते थे. शुद्र लोग रविदास जी को ब्रह्मण की तरह तिलक लगाने, कपड़े एवं जनेऊ पहनने से रोकते थे. गुरु रविदास जी इन सभी बात का खंडन करते थे, और कहते थे सभी इन्सान को धरती पर समान अधिकार है, वो अपनी मर्जी जो चाहे कर सकता है. उन्होंने हर वो चीज जो नीची जाति के लिए माना थी, करना शुरू कर दिया, जैसे जनेऊ, धोती पहनना, तिलक लगाना आदि. ब्राह्मण लोग उनकी इस गतिविधियों के सख्त खिलाफ थे. उन लोगों ने वहां के राजा से रविदास जी के खिलाफ शिकायत कर दी थी. रविदास जी सभी ब्राह्मण लोगों को बड़े प्यार और आराम से इसका जबाब देते थे. उन्होंने राजा के सामने कहा कि शुद्र के पास भी लाल खून है, दिल है, उन्हें बाकियों की तरह समान अधिकार है.
रविदास जी ने भरी सभा में सबके सामने अपनी छाती को चीर दिया और चार युग सतयुग, त्रेता,  द्वापर और कलियुग की तरह, चार युग के लिए क्रमश: सोना,  चांदी,  तांबा और कपास से जनेऊ बना दिया. राजा सहित वहां मौजूद सभी लोग बहुत शर्मसार और चकित हुए और उनके पैर छूकर गुरु जी को सम्मानित किया. राजा को अपनी बचकानी हरकत पर बहुत पछतावा हुआ, उन्होंने गुरु से माफ़ी मांगी. संत रविदास जी ने सभी को माफ़ कर दिया और कहा जनेऊ पहनने से किसी को भगवान् नहीं मिल जाते है. उन्होंने कहा कि केवल आप सभी लोगों को वास्तविकता और सच्चाई को दिखाने के लिए इस गतिविधि में शामिल किया गया है. उन्होंने जनेऊ उतार कर राजा को दे दिया, और इसके बाद उन्होंने कभी भी न जनेऊ पहना, न तिलक लगाया.
रविदास जी के पिता की मृत्यु (Guru Ravidas Father Death) –
रविदास जी के पिता की मौत के बाद उन्होंने अपने पड़ोसियों से मदद मांगी, ताकि वे गंगा के तट पर अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सकें. ब्राह्मण इसके खिलाफ थे, क्यूंकि वे गंगा जी में स्नान किया करते थे, और शुद्र का अंतिम संस्कार उसमें होने से वो प्रदूषित हो जाती. उस समय गुरु जी बहुत दुखी और असहाय महसूस कर रहे थे, लेकिन इस घड़ी में भी उन्होंने अपना संयम नहीं खोया और भगवान से अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए प्राथना करने लगे. फिर वहां एक बहुत बड़ा तूफान आया, नदी का पानी विपरीत दिशा में बहने लगता है. फिर अचानक पानी की एक बड़ी लहर मृत शरीर के पास आई और अपने में सारे अवशेषों को अवशोषित कर लिया. कहते है तभी से गंगा नदी विपरीत दिशा में बह रही है.
रविदास और मुगल शासक बाबर –
भारत के इतिहास के अनुसार बाबर मुग़ल साम्राज्य का पहला शासक था, जिसने 1526 में पानीपत की लड़ाई जीत कर, दिल्ली में कब्ज़ा किया था. बाबर गुरु रविदास जी के आध्यात्मिक शक्तियों के बारे में बहुत अच्छे से जानता था, वो उनसे मिलना चाहता था. फिर बाबर, हुमायूँ के साथ उनसे मिलने जाता है, वो उनके पैर छुकर उन्हें सम्मान देता है. गुरु जी उसे आशीर्वाद देने की जगह उसे दंडित करते है, क्यूंकि उसने बहुत से मासूम लोगों मारा था. गुरु जी बाबर को गहराई से शिक्षा देते है, जिससे प्रभावित होकर बाबर रविदास जी का अनुयाई बन जाता है और अच्छे सामाजिक कार्य करने लगता है.बाबर जीवन परिचय इतिहास यहाँ पढ़ें.
रविदास जी की मृत्यु (Sant Ravidas Death) –
गुरु रविदास जी की सच्चाई, मानवता, भगवान् के प्रति प्रेम, सद्भावना देख, दिन पे दिन उनके अनुयाई बढ़ते जा रहे थे. दूसरी तरफ कुछ ब्राह्मण उनको मारने की योजना बना रहे थे. रविदास जी के कुछ विरोधियों ने एक सभा का आयोजन किया, उन्होंने गाँव से दूर सभा आयोजित की और उसमें गुरु जी को आमंत्रित किया. गुरु जी उन लोगों की उस चाल को पहले ही समझ जाते है. गुरु जी वहाँ जाकर सभा का शुभारंभ करते है. गलती से गुरु जी की जगह उन लोगों का साथी भल्ला नाथ मारा जाता है. गुरु जी थोड़ी देर बाद जब अपने कक्ष में शंख बजाते है, तो सब अचंभित हो जाते है. अपने साथी को मरा देख वे बहुत दुखी होते है, और दुखी मन से गुरु जी के पास जाते है.
रविदास जी के अनुयाईयों का मानना है कि रविदास जी 120 या 126 वर्ष बाद अपने आप शरीर को त्याग देते है. लोगों के अनुसार 1540 AD में वाराणसी में उन्होंने अंतिम सांस ली थी.
रविदास जयंती 2019 में कब है? (Guru Ravidas Jayanti 2019 Date) –
रविदास जयंती को माघ महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. रविदास्सिया समुदाय के लिए इस दिन वार्षिक उत्सव होता है. वाराणसी में इनके जन्म स्थान ‘श्री गुरु रविदास जनम अस्थान’ में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते है. जहाँ लाखों की संख्या में रविदास जी के भक्त वहां पहुँचते है.
इस साल रविदास जी की जयंती 19 फरवरी 2019, दिन मंगलवार में मनाई जाएगी, जो उनका 642 वा जन्म दिवस होगा. सिख समुदाय द्वारा जगह जगह नगर कीर्तन का आयोजन किया जाता है. स्पेशल आरती की जाती है. मंदिर, गुरुद्वारा में रविदास जी के गाने, दोहे बजाये जाते है. कुछ अनुयाई इस दिन पवित्र नदी में स्नान करते है, और फिर रविदास की फोटो या प्रतिमा की पूजा करते है. रविदास जयंती मनाने का उद्देश्य यही है, कि गुरु रविदास जी की शिक्षा को याद किया जा सके, उनके द्वारा दी गई भाईचारे, शांति की सीख को दुनिया वाले एक बार फिर अपना सकें.
रविदास स्मारक (Sant Ravidas smarak park)
वाराणसी में रविदास जी की याद में बहुत से स्मारक बनाये गए है. रविदास पार्क, रविदास घाट, रविदास नगर, रविदास मेमोरियल गेट आदि..

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

क्या संविधान लिखकर वाकई कोई कारनामा किया

क्या संविधान लिखकर वाकई कोई कारनामा किया था बाबा साहेब ने? चलो इसबार सच्चाई जान लेते हैं।

1895 में पहली बार बाल गंगाधर तिलक ने संविधान लिखा था अब इससे ज्यादा मैं इस संविधान पर न ही बोलूँ वह ज्यादा बेहतर है, फिर 1922 में गांधीजी ने संविधान की मांग उठाई,  मोती लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और पटेल-नेहरू तक न जाने किन किन ने और कितने संविधान पेश किये । ये आपस् में ही एक प्रारूप बनाता तो दूसरा फाड़ देता, दुसरा बनाता तो तीसरा फाड़ देता और  इस तरह 50 वर्षों में कोई भी व्यक्ति भारत का एक (संविधान) का प्रारूप ब्रिटिश सरकार के सम्पक्ष पेश नही कर सके। उससे भी मजे की बात कि संविधान न अंग्रेजों को बनाने दिया और न खुद बना सके। अंग्रेजों पर यह आरोप लगाते कि तुम संविधान बनाएंगे तो उसे हम आजादी के नजरिये से स्वीकार कैसे करें। बात भी सत्य थी लेकिन भारत के किसी भी व्यक्ति को यह मालूम नही था कि इतने बड़े देश का संविधान कैसे होगा और उसमे क्या क्या चीजें होंगी? लोकतंत्र कैसा होगा? कार्यपालिका कैसी होगी? न्यायपालिका कैसी होगी? समाज को क्या अधिकार, कर्तव्य और हक होंगे आदि आदि..

अंग्रेज भारत छोड़ने का एलान कर चुके थे लेकिन वो इस शर्त पर कि उससे पहले तुम भारत के लोग अपना संविधान बना लें जिससे तुम्हारे भविष्य के लिए जो सपने हैं उन पर तुम काम कर सको। इसके बावजूद भी कई बैठकों का दौर हुआ लेकिन कोई भी भारतीय संविधान की वास्तविक रूपरेखा तक तय नही कर सका। यह नौटँकीयों का दौर खत्म नही हो रहा था,साइमन कमीशन जब भारत आने की तैयारी में था उससे पहले ही भारत के सचिव लार्ड बर्कन हेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती भरे स्वर में भारत के सभी नेताओं, राजाओं और प्रतिनिधियों से कहा कि इतने बड़े देश में यदि कोई भी व्यक्ति संविधान का मसौदा पेश नही करता तो यह दुर्भाग्य कि बात है। यदि तुम्हे ब्रिटिश सरकार की या किसी भी सलाहकार अथवा जानकार की जरूरत है तो हम तुम्हारी मदद करने को तैयार है और संविधान तुम्हारी इच्छाओं और जनता की आशाओं के अनुरूप हो। फिर भी यदि तुम कोई भी भारतीय किसी भी तरह का संविधानिक मसौदा पेश करते हैं हम उस संविधान को बिना किसी बहस के स्वीकार कर लेंगे। मगर यदि  तुमने संविधान का मसौदा पेश नही किया तो संविधान हम बनाएंगे और उसे सभी को स्वीकार करना होगा।

यह मत समझना कि आजकल जैसे कई संगठन संविधान बदलने की बातें करते हैं और यदि अंग्रेज हमारे देश के संविधान को लिखते तो हम आजादी के बाद उसे संशोधित या बदल देते। पहले आपको यह समझना आवश्यक है कि जब भी किसी देश का संविधान लागू होता है तो वह संविधान उस देश का ही नही मानव अधिकार और सयुंक्त राष्ट्र तथा विश्व समुदाय के समक्ष एक दस्तावेज होता है जो देश का प्रतिनिधित्व और जन मानस के अधिकारों का संरक्षण करता है। दूसरी बात किसी भी संविधान के संशोधन में संसद का बहुमत और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की भूमिका के साथ समाज के सभी तबकों की सुनिश्चित एवं आनुपातिक भागीदारी भी अवश्य है। इसलिए फालतू के ख्याल दिमाग से हटा देने चाहिए। दुसरा उदाहरण।

जापान एक विकसित देश है। अमेरिका ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु हमले से ख़ाक कर दिया था उसके बाद जापान का पुनरूत्थान करने के लिए अमेरिका के राजनेताओं, सैन्य अधिकारियों और शिक्षाविदों ने मिलकर जापान का संविधान लिखा था। फरवरी 1946 में कुल 24 अमेरिकी लोगों ने जापान की संसद डाइट के लिए कुल एक सप्ताह में वहां के संविधान को लिखा था जिसमे 16 अमेरिकी सैन्य अधिकारी थे। आज भी जापानी लोग यही कहते है कि काश हमे भी भारत की तरह अपना संविधान लिखने का अवसर मिला होता। बावजूद इसके जापानी एक धार्मिक राष्ट्र और अमेरिका एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होते हुए दोनों देश तरक्की और खुशहाली पर जोर देते हैं।

लार्ड बर्कन की चुनौती के बाद भी कोई भी व्यक्ति संवैधानिक मसौदा तक पेश नही कर सका और दुनिया के सामने भारत के सिर पर कलंक लगा। इस सभा में केवल कांग्रेस ही शामिल नही थी बल्कि मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा जिसकी विचारधारा आज बीजेपी और संघ में सम्मिलित लोग थे। राजाओं के प्रतिनिधि तथा अन्य भी थे। इसलिए नेहरू इंग्लैण्ड से संविधान विशेषज्ञों को बुलाने पर विचार कर रहे थे। ऐसी बेइज्जती के बाद गांधीजी को अचानक डॉ अम्बेडकर का ख्याल आया और उन्हें संविधान सभा में शामिल करने की बात की।
इस समय तक डॉ अम्बेडकर का कहीं कोई जिक्र तक नही था, सरदार पटेल ने यहाँ तक कहा था कि डॉ अम्बेडकर के लिए दरबाजे तो क्या हमने खिड़कियाँ भी बन्द की हुई है अब देखते हैं वो कैसे संविधान समिति में शामिल होते हैं। हालाँकि संविधान के प्रति समर्पण को देखते हुए पटेल ने बाबा साहेब को सबसे अच्छी फसल देने वाला बीज कहा था। कई सदस्य, कई समितियां, कई संशोधन, कई सुझाव और कई देशों के विचारों के बाद केवल बीएन राव के प्रयासों पर जिन्ना ने पानी फेर दिया जब जिन्ना ने दो दो संविधान लिखने पर अड़ गए। एक पाकिस्तान के लिए और एक भारत के लिए।

पृथक पाकिस्तान की घोषणा के बाद पहली बार 9 दिसम्बर 1946 से भारतीय संविधान पर जमकर कार्य हुए। इस तरह डॉ अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करके दुनिया को चौंकाया। आज वो लोग संविधान बदलने की बात करते हैं जिनके पूर्वजों ने जग हंसाई करवाई थी। मसौदा तैयार करने के पश्चात आगे इसे अमलीजामा पहनाने पर कार्य हुआ जिसमें भी खूब नौटँकियां हुई .. अकेले व्यक्ति बाबा साहेब थे जिन्होंने संविधान पर मन से कार्य किये। पूरी मेहनत और लगन से आज ही के दिन पुरे 2 साल 11 माह 18 दिन बाद बाबा साहेब ने देशवासियों के सामने देश का अपना संविधान रखा जिसके दम पर आज देश विकास और शिक्षा की ओर अग्रसर बढ़ रहा है और कहने वाले कहते रहें मगर बाबा साहेब के योगदान ये भारत कभी नही भुला सकता है। हम उनको संविधान निर्माता के रूप तक सीमित नही कर सकते, आर्किटेक्ट ऑफ़ मॉडर्न इंडिया यूँ ही नही कहा गया कुछ तो जानना पड़ेगा उनके योगदान, समर्पण, कर्तव्य और संघर्षों को।

Abheya Das Deoband,