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सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

गुरु आदि परगास ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास जी महाराज,

 ।।पंजाब विधानसभा सन 1937 के सदस्य।।


सन 1936-1937 में गुलाम भारतवर्ष में पहले विधानसभा चुनाव चुनाव हुए थे, जिस में साहिबे कलाम मंगू राम जी ने, चुनाव लड़ कर आदधर्म का परचम सारे विश्व में, लहराया था। वे इसी चुनाव में अछूतों को आरक्षण लागू करवाने में भी सफल हो गए थे। भारतवर्ष का संविधान तो 1947 में बनना श्रु हुआ था और लागू 1950 में हुआ था, मगर ये महाउपलब्धि परमपूज्य साहिबे कलामें मंगू राम मुगोवाल जी, गुरु आदि परगास ग्रँथ के रचयिता स्वामी ईशरदास जी महाराज, बीडीओ हजारा सिंह पिपलांवाला पंजाब और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज कानपुर उतर प्रदेश के


आंदोलनकारियों, प्रदर्शनकारियों की ही थी। पंजाब विधानसभा के 175 विधायकों के लिये चुनाव मार्च 1937 में हुए थे, जिन का विवरण निम्नलिखित है।


1 सर्व माननीय मेजर सरदार सर सिकन्दर हयात खान पश्चिम पंजाब।


2 सरदार बहादुर डॉक्टर सरदार सर सुंदर सिंह बटाला सिख ग्रामीण।


3 राव बहादुर चौधरी छोटू राम झझर सेंट्रल सामान्य ग्रामीण।


4 माननीय मिस्टर मनोहर लाल विश्वविद्यालय।


5 नबाबजादा मेजर मलिक खिजार हयात खान टिवाणा, खुशहाब मुहम्मदन ग्रामीण।


6 मियां अब्दुल हयात खान, दक्षिण पूर्व टाउन मोहम्मदन ग्रामीण।


7 श्रीमती रशीदा लातीफ, आंतरिक लाहौर मुहम्मदन स्त्री शहरी।


8 खान बहादुर नबाब मलिक अल्ला बख़्श खान , शाहपुर मुहम्मदन शहरी।


9 सरदार प्रताप सिंह, अमृतसर दक्षिण सिख ग्रामीण।


10 खान बहादुर नबाब मुजफ्फर खान, अटोक उतर, मुहम्मदन ग्रामीण।


11 सरदार मेजर मुहम्मद नबाज खान, अटोक सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


12 सरदार सोहन सिंह जोश, अमृतसर सिख ग्रामीण।


13 चौधरी सर सहाबुद्दीन, सियालकोट दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


14 डॉक्टर मुहम्मद आलम, रावलपिंडी डिवीजन टाउन मुहम्मदन शहरी।


15 डॉक्टर शेफुद्दीन किचलू, अमृतसर शहर, मुहम्मदन शहरी।


16 शेख फैज मुहम्मद, डेरा गाजी खान, सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


17 सरदार नरोत्तम सिंह, दक्षिण पूर्व पंजाब सिख ग्रामीण।


18 सरदार गोपाल सिंह, लुधियाना और फिरोजपुर सामान्य, आरक्षित सीट ग्रामीण।


19 चौधरी मुहम्मद यासीन खान, उतर पश्चिम गुड़गांव मुहम्मदन ग्रामीण।


20 राय साहिब चौधरी हेतराम, हिसार दक्षिण सामान्य, ग्रामीण।


21 श्री खालिद लतीफ गाऊबा, आंतरिक लाहौर, मुहम्मदन शहरी।


22 मलिक बरक़त अली, पूर्व टाउन मुहम्मदन शहरी।


23 मलिक हबीबुल्ला खान, सरगोदा मुहम्मदन ग्रामीण।


24 चाननसिंह, कसूर सिख ग्रामीण।


25 सरदार साहिब सरदार संतोख सिंह, पूर्व टाउन सिख शहरी।


26 सरदार कपूर सिंह, लुधियाना पूर्व सिख ग्रामीण।


27 चौधरी जल्लालूद्दीन अंबर, पश्चिम सेंट्रल पंजाब भारतीय क्रिश्चियन।


28 महंत प्रेम सिंह, गुजरात और शाहपुर सिख ग्रामीण।


29 सरदार मुजफ्फर अली खान, लाहौर मुहम्मदन ग्रामीण।


30 सरदार हरि सिंह, कांगड़ा और उत्तर होशियारपुर सिख ग्रामीण।


31 सरदार लालसिंह, लुधियाना सेंट्रल सिख ग्रामीण।


32 सरदार साहिब सरदार उज्जल सिंह, पश्चिम टाउन सिख शहरी।


33 डॉक्टर गोपी चन्द भार्गब, लाहौर शहर सामान्य शहरी।


34 प्रोफेसर डब्ल्यू रोबर्ट यूरोपियन।


35 लाला दुनी चन्द अंबाला और शिमला सामान्य ग्रामीण।


36 कैप्टन दीना नाथ, कांगड़ा दक्षिण सामान्य ग्रामीण।


37 मियां मुहम्मद इफ्तिखारूद्दीन, कौर मुहम्मदन ग्रामीण।


38 श्रीमती जहाँआरा शाह नबाज, आउटर लाहौर मुहम्मदन स्त्री शहरी।


39 लाला भीम सेन सच्चर, उतर पश्चिम टाउन सामान्य शहरी।


40 चौधरी कृष्णा गोपाल दत्त, उतर पूर्व टाउन सामान्य शहरी।


41 चौधरी टिक्का राम, रोहतक उतर सामान्य ग्रामीण।


42 शेख करामात अली, ननकाना साहिब मुहम्मदन ग्रामीण।


43 मास्टर काबुल सिंह, जालंधर पूर्व सिख ग्रामीण।


44 खान साहिब चौधरी रियासत अली, हफीजावाद मुहम्मदन ग्रामीण।


45 चौधरी मुहम्मद हसन,लुधियाना मुहम्मदन ग्रामीण।


46 राजा गजानफर अली खान, पिंड दादन खान मुहम्मदन ग्रामीण।


47 सरदार रूर सिंह, फिरोजपुर पूर्व सिख ग्रामीण।


48 चौधरी करतार सिंह, होशियारपुर पश्चिम।


49 टिक्का जगजीतसिंह बेदी, मुंटगुमरी पूर्व सिख ग्रामीण।


50 पंडित मुनी लाल कालिया, लुधियाना और फिरोजपुर सामान्य ग्रामीण।


51 नबाबजादा मुहम्मद फैज अली खान, करनाल मुहम्मदन ग्रामीण।


52 डॉक्टर संतराम सेठ, अमृतसर शहर सामान्य शहरी।


53 मखदूमजादा हाजी सियोद मोहम्मद रजा शाह जिल्लानी, सूजावाद मुहम्मदन ग्रामीण।


54 लाला सुदर्शन, पूर्वी टाउन सामान्य शहरी।


55 मौलवी गुलाम मौउद्दीन, शेखुपुरा मुहम्मदन ग्रामीण।


56 पंडित श्री राम शर्मा, दक्षिण टाउन सामान्य शहरी।


57 मीर मकबूल महमूद, अमृतसर मुहम्मदन ग्रामीण।


58 लाला भगत राम छोटा, जालंधर सामान्य ग्रामीण।


60 मिस्टर एस पी सिंघा, पूर्वी सेंट्रल पंजाब भारतीय क्रिश्चियन।


61 सरदार हरजाब सिंह, होशियारपुर दक्षिण सिख ग्रामीण।


62 श्रीमती रघुवीर कौर, अमृतसर सिख स्त्री।


63 सैयद अफजल अली हसन, शाहदरा मुहम्मदन ग्रामीण।


64 श्रीमती पार्वती जय चन्द, लाहौर शहर सामान्य स्त्री।


65 राय बहादुर मिस्टर मुकन्द लाल पुरी, रावलपिंडी डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


66 डॉक्टर सर गोकल चन्द नारंग, पश्चिम लाहौर डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


67 नबाब खान शाह नबाज खान, फिरोजपुर सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


68 नबाब सर मलिक मुहम्मद हयात खान नूर, उतर पंजाब।


69 खान बहादुर नबाब चौधरी फैजल अली, गुजरात पूर्वी मुहम्मदन ग्रामीण।


70 मियां अब्दुल अजीज, आउटर लाहौर मुहम्मदन शहरी।


71 सरदार दसौंदा सिंह, जगराओं सिख ग्रामीण।


72 खान बहादुर नबाब सर मुहम्मद जमाल खान, लेघारि, तुमानदार।


73 राय साहिब लाल गोपाल दास, कांगड़ा उतर सामान्य ग्रामीण।


74 मिस्टर सी राय, अमृतसर सियालकोट सामान्य ग्रामीण।


75 राव बहादुर कैपटन राव बलवीर सिंह, उतर पश्चिम गुड़गांव सामान्य ग्रामीण।


76 खान बहादुर मियां अहमद यार खान दौलताना मैलसी मुहम्मदन ग्रामीण।


77 चौधरी फकीर खान, तरनतारन मुहम्मदन ग्रामीण।


78 खान बहादुर मिंयाँ मुस्ताक अहमद गुरमानी, मुजफ्फरगढ़ उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


79 पीर अकबर अली शाह, फाजिलका  मुहम्मदन ग्रामीण।


80 सैयद मुबारक अली शाह, झांग सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


81 खान हैबत खान दाहा, खानेबाल मुहम्मदन ग्रामीण।


82 चौधरी साहिब दाद खान, हिसार मुहम्मदन ग्रामीण।


83 मियां नुरुल्ला, लायलपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


84 खुआजा गुलाम समंद, दक्षिण टाउन मुहम्मदन ग्रामीण।


85 राय बहादुर सरदार विशाखा सिंह, अमृतसर सेंट्रल सिख ग्रामीण।


86 भगत हंसराज, अमृतसर और सियालकोट सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


87 राय बहादुर बिंदा सारन, पंजाब कॉमर्स और उद्योग।


88 राय बहादुर लाला शाम लाल, पश्चिम मुल्तान डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


89 महंत गिरधारी दास, दक्षिण पूर्वी मुल्तान डिवीजन सामान्य ग्रामीण।


90 सेठ राम नारायण अरोड़ा, लायलपुर और झांग सामान्य ग्रामीण।


91 ठाकुर रिपुदमन सिंह,गुरदासपुर सामान्य ग्रामीण। 


92 लाला शिव दयाल, दक्षिण पश्चिम टाउन सामान्य शहरी।


93 राय भगवंत सिंह, कांगड़ा पूर्व सामान्य ग्रामीण।


94 पीर मोयुद्दीन लाल बादशाह, अटोक दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


95 खान साहिब मिंयाँ नूर अहमद खान, दीपालपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


96 सैयद अमजद अली शाह, फिरोजपुर पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


97 चौधरी उमर हयात खान, भालबल मुहम्मदन ग्रामीण।


98 कैप्टन आशिक़ हुसैन, मुल्तान मुहम्मदन ग्रामीण।


99 खान साहिब राय शहादत खान, जारांवाला मुहम्मदन ग्रामीण।


100 खान बहादुर कैप्टन मलिक मुजफ्फर खान, मिंयाँवाली दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


101 खान साहिब चौधरी पीर मुहम्मद, दक्षिण पूर्व गुजरात मुहम्मदन ग्रामीण।


102 राजा मुहम्मद सरफ़राज़ खान, चकवाल मुहम्मदन ग्रामीण।


103 खान बहादुर मखदूम सैयद, मिझाम्मद हसन अलीपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


104 खान बहादुर सरदार मुहम्मद हसन खान गुरचानी, डेरा गाजीखान दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


105 सरदार उत्तम सिंह दुग्गल, उतर पश्चिम पंजाब सिख ग्रामीण।


106 सेठ किशन दास, जालंधर सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


107 लाला सीता राम, ट्रेड यूनियन लेबर।


108 दीवान चमन लाल, पूर्व पंजाब नान यूनियन पंजाब।


109 राय साहिब लाला आत्मा राम, हिसार उतर सामान्य ग्रामीण।


110 मौलवी मझार अली आझार, उतर पूर्वी टाउन मुहम्मदन शहरी।


111 पंडित भगत राम, कांगड़ा पश्चिम सामान्य ग्रामीण।


112 ख्वाजा गुलाम हुसैन, मुल्तान डिवीजन टाउन, मुहम्मदन शहरी।


113 खान साहिब चौधरी फजलद्दीन, अजनाला मुहम्मदन ग्रामीण।


114 चौधरी मुहम्मद अब्दुल रहमान खान, जालंधर उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


115 मिंयाँ फतेह मुहम्मद, गुजरात उतर, मुहम्मदन ग्रामीण।


116 मिंयाँ अहमद बख़्श खान, उतर पंजाब, नान यूनियन लेबर।


117 सरदार बलि मुहम्मद सियाल हिराज, कबीरवाला मुहम्मदन ग्रामीण।


118 चौधरी नसीरूद्दीन, गुजरांवाला उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


119 सूबेदार मेजर फरमान अली खान, गुजर खान मुहम्मदन ग्रामीण।


120 खान बहादुर राजा मुहम्मद अकरम खान, झेलम मुहम्मदन ग्रामीण।


121 खान साहिब नबाब मुहम्मद सादात अली खान, समूँद्री मुहम्मदन ग्रामीण।


122 चौधरी अली अकबर, गुरदासपुर पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


123 लियूटीनेंट सोढ़ी हरनाम सिंह, फिरोजपुर उतर सिख ग्रामीण।


124 खान साहिब चौधरी मुहम्मद सफी अली खान, रोहतक मुहम्मदन ग्रामीण।


125 सरदार अजीत सिंह, दक्षिण पश्चिम पंजाब सिख ग्रामीण।


126 चौधरी प्रेम सिंह, दक्षिण पूर्व गुड़गांव, सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


127 सरदार साहिब सरदार गुरबचन सिंह, जालंधर पश्चिम सिख ग्रामीण।


128 चौधरी अनन्त राम, करनाल दक्षिण सामान्य ग्रामीण।


129 चौधरी राम स्वरूप, रोहतक सेंट्रल सामान्य ग्रामीण।


130 सरदार मूला सिंह, होशियारपुर पश्चिम सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


131 मिंयाँ बद्दर मोयुद्दीन कादरी, बटाला मुहम्मदन ग्रामीण।


132 खान तालिब हुसैन खान, झांग पश्चिम मुहम्मदन ग्रामीण।


133 मखदूमजादा हाजी सैयद मुहम्मद बिलयात हुसैन जीलानी, लोधराम मुहम्मदन ग्रामीण।


134ख्वाजा गुलाम मुर्तज़ा, डेरा गाजीखान उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


135 मिंयाँ अब्दुल राब, जालंधर दक्षिण मुहम्मदन ग्रामीण।


136 चौधरी मुहम्मद हुसैन, गुजरांवाला पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


137 राणा नसरुल्ला खान, होशियारपुर पश्चिम मुहम्मदन ग्रामीण।


138 खान मुहम्मद यूसफ़ खान, रावलपिंडी सदर मुहम्मदन ग्रामीण।


139 सूफी अब्दुल हमीद खान, अंबाला और शिमला मुहम्मदन ग्रामीण।


140 पीर नसीरूद्दीन शाह, टोबा टेक सिंह मुहम्मदन ग्रामीण।


141 लाला हरनाम दास, लायलपुर और झांग सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


142 सरदार तारा सिंह, फिरोजपुर दक्षिण सिख ग्रामीण।


143 चौधरी जुगल किशोर, अंबाला और शिमला सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


144 सरदार प्रीतम सिंह, फिरोजपुर पश्चिम सिख ग्रामीण।


145 चौधरी फकीर चन्द, करनाल उतर सामान्य आरक्षित सीट ग्रामीण।


146 सरदार इंद्र सिंह, गुरदासपुर उतर सिख ग्रामीण।


147 राय हरि चन्द, ऊना सामान्य ग्रामीण।


148 लियूटीनेंट सरदार नौनिहाल सिंह मॉन, शेखुपुरा पश्चिम सिख ग्रामीण।


149 चौधरी रनपत, करनाल उतर सामान्य ग्रामीण।


150 राय फैज मुहम्मद खान, कांगड़ा और पूर्वी होशियारपुर मुहम्मदन ग्रामीण।


151राजा फतेह खान, रावलपिंडी पूर्व मुहम्मदन ग्रामीण।


152 चौधरी अब्दुल रहीम, शक्कर गढ़ मुहम्मदन ग्रामीण।


153 चौधरी मुहम्मद सरफ़राज़ खान, सियालकोट उतर मुहम्मदन ग्रामीण।


154 चौधरी अहमद यार खान, उतर पश्चिम गुजरात मुहम्मदन ग्रामीण।


155 चौधरी गुलाम रसूल, सियालकोट सेंट्रल मुहम्मदन ग्रामीण।


156 सरदार मुहम्मद हुसैन, चुनियन मुहम्मदन ग्रामीण।


157 चौधरी अब्दुल रहीम, दक्षिण पूर्वी गुड़गांव मुहम्मदन ग्रामीण।


158 मलिक फतेह शेर खान, मिंटगुमरी मुहम्मदन ग्रामीण।


159 खान साहिब गुलाम कादिर खान, मिंयाँवाली उटर मुहम्मदन ग्रामीण।


160 चौधरी जहांगीर खान, ओकरा मुहम्मदन ग्रामीण।


161 मिंयाँ फैजल करीम बख़्श, मुजफ्फरगढ़ सदर, मुहम्मदन ग्रामीण।


162 मिंयाँ सुल्तान महमूद हतियाना, पाक पाटन, मुहम्मदन ग्रामीण।


163 चौधरी मुहम्मद अशरफ, दक्षिण पश्चिम  गुजरात मुहम्मदन ग्रामीण।


164 सरदार बलवंत सिंह, सियालकोट सिख ग्रामीण।


165 चौधरी सुमेर सिंह, दक्षिण पूर्व गुड़गांव सामान्य ग्रामीण।


166 सरदार जोगिंद्र सिंह मॉन, गुजरांवाला और शाहदरा सिख ग्रामीण।


167 चौधरी सूरज मल, हांसी सामान्य ग्रामीण।


168 सरदार जगजीत सिंह मॉन, सेंट्रल पंजाब लैंड होल्डर।


सात व्यक्ति दो दो विधानसभाओं से चुने गए थे, जिन के खाली पड़े पद बाद में भरे गए थे

ABHEYDAS DeOBAND

                

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

भारतवर्ष कैसे सोने की चिड़िया कहलाता है।

 


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सबसे पहले भारत वर्ष का नाम जम्मू दीप था और आज जिसका नाम भारतवर्ष है वह एक टुकड़ा मात्र है जिसे आर्यवर्त भी कहते हैं जम्मू दीप में पहले देव असुर थे और बाद में कुरू वंश
और पूरू वंश लड़ाई मैं भारतवर्ष बहुत खंडों में बांटा आपस में झगड़े के कारण टुकड़ों में बट गया जम्मू दीप धरती के बीचो बीच है जम्मू दीप का विस्तार 100000 योजन है जम्मू दीप पर जामुन के अधिक पेड़ होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्मू  द्वीप पड़ा था इसमें छह पर्वत है.
1.प्लक्ष
2.शाल्मली
3.कुश
4. क्रॉच
5.शाक्य
6. पुष्कर
पुराणानुसार पृथ्वी के ये नौ खंड या ये विभाग, भारत, इलावृत्त, किंपुरुष, भद्र, केतुमाल, हरि, हिरण्य, रम्य और कुश।समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं 
मच्छेल।यवन की लड़ाई के कारण भारत जम्मू दीप में शरण दिए जाने लगे यहां हिंदू और जम्मू देवासी की आपस के मेल ना खाने और अपना हिंदुत्व को बढ़ावा देने से सभी आपस में अलग-अलग बट गए और फिर बौद्ध काल में यह मान सम्मान की लड़ाई अपने चरम सीमा पर पहुंच गई तब चाणक्य की बुद्धि से चंद्रगुप्त मौर्य की समझ से ज्ञान से भारतवर्ष का संपूर्ण विस्तार दोबारा से किया गया चंद्रगुप्त जी सभी को एक छत्र के नीचे लाने में सफल हुए इनके बाद सम्राट अशोक के बाद बृह्धृत को धोखे से मार कर उनसे सत्ता कब जाएगी और जितना भारत में धन था वह सब लूट लिया गया।
नोट,-अगर लेख में कोई त्रुटि हो तो उसे सही लिखकर भेजें
अभय दास देवबंद

सोमवार, 25 जनवरी 2021

सतगुरु समनदास ब्रह्मज्ञानी

                        सतनाम सतगुरु -


सतगुरु समनदास ब्रह्मज्ञानी अगमपुर के वासी पूर्ण अविनाशी।

धरती जब पाप के बोझ से कांपने लगती है, जलने लगती है मनुष्य ही मनुष्य को खाने लगता है मानवता खत्म हो जाती है दुनिया त्राहि-त्राहि मान हो जाती है डर ओर भय का खोप बढ जाता है तो उस समय उस अदृश्य शक्ति की याद आती है जो किसी ने न देखी ओर न पढ़ी हैं।

केवल बड़े बुजुर्गों के मुख से कहानी ओर किस्सो में सुनी है जिसे कुछ पढें लिखे लोग वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से देखना ओर पकड़ना चाहते हैं जो कि असम्भव है क्योंकि वह अदृश्य शक्ति तो भौतिक एवं रासायनिक उपकरणों से ही नही बल्कि मानुष दिमाग की सोच बुद्धि और कल्पना से भी बहुत दूर है।। ये मानुष ओर मानुष के उपकरण उसे कैसे पकड़ सकते है अभी तक तो मानुष ने मानुष की ही खोज नही की है कितने पुर्जे बाड़ी में लगे हुए हैं और कैसे लगे किस किस रसायन के लगे हैं। और चैलेंज करता है उस अदृश्य शक्ति के अस्तित्व को।

छोडिये इन बातों को मै बात कर रहा था जब धरती पाप के बोझ से कांपने लगती है अपना संतुलन खोने लगती है तो दुनिया में प्रलय ओर महाप्रलय तक भी आ जाती है, आकाश भी अंगार उगलने लगता है जिसके कारण मानव सभ्यता भी नष्ट हो जाती है।

उसी प्रलय ओर महाप्रलय को रोकने के लिए वो अदृश्य शक्ति संतो के रूप में प्रकृट होती है जो मनुष्य को सत्य का बौद्ध कराती है और असत्य से हटाकर पुरुषार्थ और भक्ति के मार्ग पर लगाती है जिस कारण धरती ओर धरती पर रहने वाले मनुष्यों का जीवन बच जाता है।

 उस अदृश्य शक्ति को संतो की भाषा में सतगुरु कहते हैं। समय के अनुसार आते हैं और चले जाते हैं जैसे - - सतगुरु रविदास जी महाराज, सतगुरु समनदास जी महाराज, चेतादास जो महाराज, अष्टावक्र,ऐसे बहुत सारे संतो का आवागमन हुआ है जिनके अंदर वो अदृश्य शक्ति विराजमान रही है उसको केवल महसूस किया जा सकता है न कि देख पाये या उसे छू पाये।

ताजा उदाहरण सतगुरु स्वामी समनदास जी महाराज रहे हैं जिनको जानना व पढ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। लेकिन वे हर किसी को पढ लेते थे। वे हमेशा लोक ओर परलोक की बात करते थे।

आगे की अगली पोस्ट में करेंगे।

सतनाम सतगुरु

(स्टार फिल्म स्टूडियो देवबंद )

अभय दास 9358190235








शुक्रवार, 22 मार्च 2019

क्रमांकजीवन परिचय बिंदुरविदास जी जीवन परिचय
1.पूरा नामगुरु रविदास जी
2.अन्य नामरैदास, रोहिदास, रूहिदास
3.जन्म1377 AD
4.जन्म स्थानवाराणसी, उत्तरप्रदेश
5.पिता का नामश्री संतोख दास जी
6.माता का नामश्रीमती कलसा देवी की
7.दादा का नामश्री कालू राम जी
8.दादी का नामश्रीमती लखपति जी
9.पत्नीश्रीमती लोना जी
10.बेटाविजय दास जी
11.मृत्यु1540 AD (वाराणसी)
गुरु रविदास जी का जन्म वाराणसी के पास सीर गोबर्धनगाँव में हुआ था. इनकी माता कलसा देवी एवं पिता संतोख दास जी थे. रविदास जी के जन्म पर सबकी अपनी अपनी राय है, कुछ लोगों का मानना है इनका जन्म 1376-77 के आस पास हुआ था, कुछ कहते है 1399 CE. कुछ दस्तावेजों के अनुसार रविदास जी ने 1450 से 1520 के बीच अपना जीवन धरती में बिताया था. इनके जन्म स्थान को अब ‘श्री गुरु रविदास जन्म स्थान’ कहा जाता है.
रविदास जी के पिता राजा नगर राज्य में सरपंच हुआ करते थे. इनका जूते बनाने और सुधारने का काम हुआ करता था. रविदास जी के पिता मरे हुए जानवरों की खाल निकालकर उससे चमड़ा बनाते और फिर उसकी चप्पल बनाते थे. 
रविदास जी बचपन से ही बहुत बहादुर और भगवान् को बहुत मानने वाले थे. रविदास जी को बचपन से ही उच्च कुल वालों की हीन भावना का शिकार होना पड़ा था, वे लोग हमेशा इस बालक के मन में उसके उच्च कुल के न होने की बात डालते रहते थे. रविदास जी ने समाज को बदलने के लिए अपनी कलम का सहारा लिया, वे अपनी रचनाओं के द्वारा जीवन के बारे में लोगों को समझाते. लोगों को शिक्षा देते कि इन्सान को बिना किसी भेदभाव के अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना चाहिए.
रविदास जी की शिक्षा (Sant Ravidas education) 
बचपन में रविदास जी अपने गुरु पंडित शारदा नन्द की पाठशाला में शिक्षा लेने जाया करते थे. कुछ समय बाद ऊँची जाति वालों ने उनका पाठशाला में आना बंद करवा दिया था. पंडित शारदा नन्द जी ने रविदास जी की प्रतिभा को जान लिया था, वे समाज की उंच नीच बातों को नहीं मानते थे, उनका मानना था कि रविदास भगवान द्वारा भेजा हुआ एक बच्चा है. जिसके बाद पंडित शारदा नन्द जी ने रविदास जी को अपनी पर्सनल पाठशाला में शिक्षा देना शुरू कर दिया. वे एक बहुत प्रतिभाशाली और होनहार छात्र थे, उनके गुरु जितना उन्हें पढ़ाते थे, उससे ज्यादा वे अपनी समझ से शिक्षा गृहण कर लेते थे. पंडित शारदा नन्द जी रविदास जी से बहुत प्रभावित रहते थे, उनके आचरण और प्रतिभा को देख वे सोचा करते थे, कि रविदास एक अच्छा आध्यात्मिक गुरु और महान समाज सुधारक बनेगा.
रविदास जी के साथ पाठशाला में पंडित शारदा नन्द जी का बेटा भी पढ़ता था, वे दोनों अच्छे मित्र थे. एक बार वे दोनों छुपन छुपाई का खेल रहे थे, 1-2 बार खेलने के बाद रात हो गई, जिससे उन लोगों ने अगले दिन खेलने की बात कही. दुसरे दिन सुबह रविदास जी खेलने पहुँचते है, लेकिन वो मित्र नहीं आता है. तब वो उसके घर जाते है, वहां जाकर पता चलता है कि रात को उसके मित्र की मृत्यु हो गई है. ये सुन रविदास सुन्न पड़ जाते है, तब उनके गुरु शारदा नन्द जी उन्हें मृत मित्र के पास ले जाते है. रविदास जी को बचपन से ही अलौकिक शक्तियां मिली हुई थी, वे अपने मित्र से कहते है कि ये सोने का समय नहीं है, उठो और मेरे साथ खेलो. ये सुनते ही उनका मृत दोस्त खड़ा हो जाता है. ये देख वहां मौजूद हर कोई अचंभित हो जाते है.
संत रविदास का आगे का जीवन (Sant Ravidas life history) 
रविदास जी जैसे जैसे बड़े होते जाते है, भगवान राम के रूप के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती जाती है. वे हमेशा राम, रघुनाथ, राजाराम चन्द्र, कृष्णा, हरी, गोविन्द आदि शब्द उपयोग करते थे, जिससे उनकी धार्मिक होने का प्रमाण मिलता था.
रविदास जी मीरा बाई के धार्मिक गुरु हुआ करते थे. मीरा बाई राजस्थान के राजा की बेटी और चित्तोर की रानी थी. वे रविदास जी की शिक्षा से बहुत अधिक प्रभावित थी और वे उनकी एक बड़ी अनुयायी बन गई थी. मीरा बाई ने अपने गुरु के सम्मान में कुछ पक्तियां भी लिखी थी, जैसे – ‘गुरु मिलया रविदास जी..’ मीरा बाई अपने माँ बाप की एकलौती संतान थी, बचपन में इनकी माता के देहांत के बाद इनके दादा ‘दुदा जी’ ने इनको संभाला था. दुदा जी रविदास जी के बड़े अनुयाई थे, मीरा बाई अपने दादा जी के साथ हमेशा रविदास जी से मिलती रहती थी. जहाँ वे उनकी शिक्षा से बहुत प्रभावित हुई. शादी के बाद मीरा बाई ने अपनी परिवार की रजामंदी से रविदास जी को अपना गुरु बना लिया था.मीरा बाई जीवन परिचय दोहे रचनाएँ यहाँ पढ़ें.
मीरा बाई अपनी रचनाओं में लिखती है, उन्हें कई बार मृत्यु से उनके गुरु रविदास जी ने बचाया थालोगों का कहना है, भगवान् ने धर्म की रक्षा के लिए रविदास जी को धरती में भेजा था, क्यूंकि इस समय पाप बहुत बढ़ गया था, लोग धर्म के नाम पर जाति, रंगभेद  करते थे. रविदास जी ने बहादुरी से सभी भेदभाव का सामना किया और विश्वास एवं जाति की सच्ची परिभाषा लोगों को समझाई. वे लोगों को समझाते थे कि इन्सान जाति, धर्म या भगवान् पर विश्वास के द्वारा नहीं जाना जाता है, बल्कि वो अपने कर्मो के द्वारा पहचाना जाता है. रविदास जी ने समाज में फैले छुआछूत के प्रचलन को भी ख़त्म करने के बहुत प्रयास किये. उस समय नीची जाति वालों को बहुत नाकारा जाता था. उनका मंदिर में पूजा करना, स्कूल में पढाई करना, गाँव में दिन के समय निकलना  पूरी तरह वर्जित था, यहाँ तक कि उन्हें गाव में पक्के मकान की जगह कच्चे झोपड़े में ही रहने को मजबूर किया जाता था. समाज की ये दुर्दशा देख रविदास जी ने समाज से छुआछूत, भेदभाव को दूर करने की ठानी और समान के लोगों को सही सन्देश देना शुरू किया.

रविदास जी लोगों को सन्देश देते थे कि ‘भगवान् ने इन्सान को बनाया है, न की इन्सान ने भगवान् को’ इसका मतलब है, हर इन्सान भगवान द्वारा बनाया गया है और सबको धरती में समान अधिकार है. संत गुरु रविदास जी  सार्वभौमिक भाईचारे और सहिष्णुता के बारे में लोगों को विभिन्न शिक्षायें दिया करते थे.
रविदास जी द्वारा लिखे गए पद, धार्मिक गाने एवं अन्य रचनाओं को सिख शास्त्र ‘गुरु गोविन्द ग्रन्थ साहिब’ में शामिल किया गया है. पांचवे सिख गुरु ‘अर्जन देव’ ने इसे ग्रन्थ में शामिल किया था. गुरु रविदास जी की शिक्षाओं के अनुयायियों को ‘रविदास्सिया’ और उनके उपदेशों के संग्रह को ‘रविदास्सिया पंथ’ कहते है.
रविदास दास जी का स्वाभाव –
रविदास जी को उनकी जाति वाले भी आगे बढ़ने से रोकते थे. शुद्र लोग रविदास जी को ब्रह्मण की तरह तिलक लगाने, कपड़े एवं जनेऊ पहनने से रोकते थे. गुरु रविदास जी इन सभी बात का खंडन करते थे, और कहते थे सभी इन्सान को धरती पर समान अधिकार है, वो अपनी मर्जी जो चाहे कर सकता है. उन्होंने हर वो चीज जो नीची जाति के लिए माना थी, करना शुरू कर दिया, जैसे जनेऊ, धोती पहनना, तिलक लगाना आदि. ब्राह्मण लोग उनकी इस गतिविधियों के सख्त खिलाफ थे. उन लोगों ने वहां के राजा से रविदास जी के खिलाफ शिकायत कर दी थी. रविदास जी सभी ब्राह्मण लोगों को बड़े प्यार और आराम से इसका जबाब देते थे. उन्होंने राजा के सामने कहा कि शुद्र के पास भी लाल खून है, दिल है, उन्हें बाकियों की तरह समान अधिकार है.
रविदास जी ने भरी सभा में सबके सामने अपनी छाती को चीर दिया और चार युग सतयुग, त्रेता,  द्वापर और कलियुग की तरह, चार युग के लिए क्रमश: सोना,  चांदी,  तांबा और कपास से जनेऊ बना दिया. राजा सहित वहां मौजूद सभी लोग बहुत शर्मसार और चकित हुए और उनके पैर छूकर गुरु जी को सम्मानित किया. राजा को अपनी बचकानी हरकत पर बहुत पछतावा हुआ, उन्होंने गुरु से माफ़ी मांगी. संत रविदास जी ने सभी को माफ़ कर दिया और कहा जनेऊ पहनने से किसी को भगवान् नहीं मिल जाते है. उन्होंने कहा कि केवल आप सभी लोगों को वास्तविकता और सच्चाई को दिखाने के लिए इस गतिविधि में शामिल किया गया है. उन्होंने जनेऊ उतार कर राजा को दे दिया, और इसके बाद उन्होंने कभी भी न जनेऊ पहना, न तिलक लगाया.
रविदास जी के पिता की मृत्यु (Guru Ravidas Father Death) –
रविदास जी के पिता की मौत के बाद उन्होंने अपने पड़ोसियों से मदद मांगी, ताकि वे गंगा के तट पर अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सकें. ब्राह्मण इसके खिलाफ थे, क्यूंकि वे गंगा जी में स्नान किया करते थे, और शुद्र का अंतिम संस्कार उसमें होने से वो प्रदूषित हो जाती. उस समय गुरु जी बहुत दुखी और असहाय महसूस कर रहे थे, लेकिन इस घड़ी में भी उन्होंने अपना संयम नहीं खोया और भगवान से अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए प्राथना करने लगे. फिर वहां एक बहुत बड़ा तूफान आया, नदी का पानी विपरीत दिशा में बहने लगता है. फिर अचानक पानी की एक बड़ी लहर मृत शरीर के पास आई और अपने में सारे अवशेषों को अवशोषित कर लिया. कहते है तभी से गंगा नदी विपरीत दिशा में बह रही है.
रविदास और मुगल शासक बाबर –
भारत के इतिहास के अनुसार बाबर मुग़ल साम्राज्य का पहला शासक था, जिसने 1526 में पानीपत की लड़ाई जीत कर, दिल्ली में कब्ज़ा किया था. बाबर गुरु रविदास जी के आध्यात्मिक शक्तियों के बारे में बहुत अच्छे से जानता था, वो उनसे मिलना चाहता था. फिर बाबर, हुमायूँ के साथ उनसे मिलने जाता है, वो उनके पैर छुकर उन्हें सम्मान देता है. गुरु जी उसे आशीर्वाद देने की जगह उसे दंडित करते है, क्यूंकि उसने बहुत से मासूम लोगों मारा था. गुरु जी बाबर को गहराई से शिक्षा देते है, जिससे प्रभावित होकर बाबर रविदास जी का अनुयाई बन जाता है और अच्छे सामाजिक कार्य करने लगता है.बाबर जीवन परिचय इतिहास यहाँ पढ़ें.
रविदास जी की मृत्यु (Sant Ravidas Death) –
गुरु रविदास जी की सच्चाई, मानवता, भगवान् के प्रति प्रेम, सद्भावना देख, दिन पे दिन उनके अनुयाई बढ़ते जा रहे थे. दूसरी तरफ कुछ ब्राह्मण उनको मारने की योजना बना रहे थे. रविदास जी के कुछ विरोधियों ने एक सभा का आयोजन किया, उन्होंने गाँव से दूर सभा आयोजित की और उसमें गुरु जी को आमंत्रित किया. गुरु जी उन लोगों की उस चाल को पहले ही समझ जाते है. गुरु जी वहाँ जाकर सभा का शुभारंभ करते है. गलती से गुरु जी की जगह उन लोगों का साथी भल्ला नाथ मारा जाता है. गुरु जी थोड़ी देर बाद जब अपने कक्ष में शंख बजाते है, तो सब अचंभित हो जाते है. अपने साथी को मरा देख वे बहुत दुखी होते है, और दुखी मन से गुरु जी के पास जाते है.
रविदास जी के अनुयाईयों का मानना है कि रविदास जी 120 या 126 वर्ष बाद अपने आप शरीर को त्याग देते है. लोगों के अनुसार 1540 AD में वाराणसी में उन्होंने अंतिम सांस ली थी.
रविदास जयंती 2019 में कब है? (Guru Ravidas Jayanti 2019 Date) –
रविदास जयंती को माघ महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. रविदास्सिया समुदाय के लिए इस दिन वार्षिक उत्सव होता है. वाराणसी में इनके जन्म स्थान ‘श्री गुरु रविदास जनम अस्थान’ में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते है. जहाँ लाखों की संख्या में रविदास जी के भक्त वहां पहुँचते है.
इस साल रविदास जी की जयंती 19 फरवरी 2019, दिन मंगलवार में मनाई जाएगी, जो उनका 642 वा जन्म दिवस होगा. सिख समुदाय द्वारा जगह जगह नगर कीर्तन का आयोजन किया जाता है. स्पेशल आरती की जाती है. मंदिर, गुरुद्वारा में रविदास जी के गाने, दोहे बजाये जाते है. कुछ अनुयाई इस दिन पवित्र नदी में स्नान करते है, और फिर रविदास की फोटो या प्रतिमा की पूजा करते है. रविदास जयंती मनाने का उद्देश्य यही है, कि गुरु रविदास जी की शिक्षा को याद किया जा सके, उनके द्वारा दी गई भाईचारे, शांति की सीख को दुनिया वाले एक बार फिर अपना सकें.
रविदास स्मारक (Sant Ravidas smarak park)
वाराणसी में रविदास जी की याद में बहुत से स्मारक बनाये गए है. रविदास पार्क, रविदास घाट, रविदास नगर, रविदास मेमोरियल गेट आदि..

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

क्या संविधान लिखकर वाकई कोई कारनामा किया

क्या संविधान लिखकर वाकई कोई कारनामा किया था बाबा साहेब ने? चलो इसबार सच्चाई जान लेते हैं।

1895 में पहली बार बाल गंगाधर तिलक ने संविधान लिखा था अब इससे ज्यादा मैं इस संविधान पर न ही बोलूँ वह ज्यादा बेहतर है, फिर 1922 में गांधीजी ने संविधान की मांग उठाई,  मोती लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और पटेल-नेहरू तक न जाने किन किन ने और कितने संविधान पेश किये । ये आपस् में ही एक प्रारूप बनाता तो दूसरा फाड़ देता, दुसरा बनाता तो तीसरा फाड़ देता और  इस तरह 50 वर्षों में कोई भी व्यक्ति भारत का एक (संविधान) का प्रारूप ब्रिटिश सरकार के सम्पक्ष पेश नही कर सके। उससे भी मजे की बात कि संविधान न अंग्रेजों को बनाने दिया और न खुद बना सके। अंग्रेजों पर यह आरोप लगाते कि तुम संविधान बनाएंगे तो उसे हम आजादी के नजरिये से स्वीकार कैसे करें। बात भी सत्य थी लेकिन भारत के किसी भी व्यक्ति को यह मालूम नही था कि इतने बड़े देश का संविधान कैसे होगा और उसमे क्या क्या चीजें होंगी? लोकतंत्र कैसा होगा? कार्यपालिका कैसी होगी? न्यायपालिका कैसी होगी? समाज को क्या अधिकार, कर्तव्य और हक होंगे आदि आदि..

अंग्रेज भारत छोड़ने का एलान कर चुके थे लेकिन वो इस शर्त पर कि उससे पहले तुम भारत के लोग अपना संविधान बना लें जिससे तुम्हारे भविष्य के लिए जो सपने हैं उन पर तुम काम कर सको। इसके बावजूद भी कई बैठकों का दौर हुआ लेकिन कोई भी भारतीय संविधान की वास्तविक रूपरेखा तक तय नही कर सका। यह नौटँकीयों का दौर खत्म नही हो रहा था,साइमन कमीशन जब भारत आने की तैयारी में था उससे पहले ही भारत के सचिव लार्ड बर्कन हेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती भरे स्वर में भारत के सभी नेताओं, राजाओं और प्रतिनिधियों से कहा कि इतने बड़े देश में यदि कोई भी व्यक्ति संविधान का मसौदा पेश नही करता तो यह दुर्भाग्य कि बात है। यदि तुम्हे ब्रिटिश सरकार की या किसी भी सलाहकार अथवा जानकार की जरूरत है तो हम तुम्हारी मदद करने को तैयार है और संविधान तुम्हारी इच्छाओं और जनता की आशाओं के अनुरूप हो। फिर भी यदि तुम कोई भी भारतीय किसी भी तरह का संविधानिक मसौदा पेश करते हैं हम उस संविधान को बिना किसी बहस के स्वीकार कर लेंगे। मगर यदि  तुमने संविधान का मसौदा पेश नही किया तो संविधान हम बनाएंगे और उसे सभी को स्वीकार करना होगा।

यह मत समझना कि आजकल जैसे कई संगठन संविधान बदलने की बातें करते हैं और यदि अंग्रेज हमारे देश के संविधान को लिखते तो हम आजादी के बाद उसे संशोधित या बदल देते। पहले आपको यह समझना आवश्यक है कि जब भी किसी देश का संविधान लागू होता है तो वह संविधान उस देश का ही नही मानव अधिकार और सयुंक्त राष्ट्र तथा विश्व समुदाय के समक्ष एक दस्तावेज होता है जो देश का प्रतिनिधित्व और जन मानस के अधिकारों का संरक्षण करता है। दूसरी बात किसी भी संविधान के संशोधन में संसद का बहुमत और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की भूमिका के साथ समाज के सभी तबकों की सुनिश्चित एवं आनुपातिक भागीदारी भी अवश्य है। इसलिए फालतू के ख्याल दिमाग से हटा देने चाहिए। दुसरा उदाहरण।

जापान एक विकसित देश है। अमेरिका ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु हमले से ख़ाक कर दिया था उसके बाद जापान का पुनरूत्थान करने के लिए अमेरिका के राजनेताओं, सैन्य अधिकारियों और शिक्षाविदों ने मिलकर जापान का संविधान लिखा था। फरवरी 1946 में कुल 24 अमेरिकी लोगों ने जापान की संसद डाइट के लिए कुल एक सप्ताह में वहां के संविधान को लिखा था जिसमे 16 अमेरिकी सैन्य अधिकारी थे। आज भी जापानी लोग यही कहते है कि काश हमे भी भारत की तरह अपना संविधान लिखने का अवसर मिला होता। बावजूद इसके जापानी एक धार्मिक राष्ट्र और अमेरिका एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होते हुए दोनों देश तरक्की और खुशहाली पर जोर देते हैं।

लार्ड बर्कन की चुनौती के बाद भी कोई भी व्यक्ति संवैधानिक मसौदा तक पेश नही कर सका और दुनिया के सामने भारत के सिर पर कलंक लगा। इस सभा में केवल कांग्रेस ही शामिल नही थी बल्कि मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा जिसकी विचारधारा आज बीजेपी और संघ में सम्मिलित लोग थे। राजाओं के प्रतिनिधि तथा अन्य भी थे। इसलिए नेहरू इंग्लैण्ड से संविधान विशेषज्ञों को बुलाने पर विचार कर रहे थे। ऐसी बेइज्जती के बाद गांधीजी को अचानक डॉ अम्बेडकर का ख्याल आया और उन्हें संविधान सभा में शामिल करने की बात की।
इस समय तक डॉ अम्बेडकर का कहीं कोई जिक्र तक नही था, सरदार पटेल ने यहाँ तक कहा था कि डॉ अम्बेडकर के लिए दरबाजे तो क्या हमने खिड़कियाँ भी बन्द की हुई है अब देखते हैं वो कैसे संविधान समिति में शामिल होते हैं। हालाँकि संविधान के प्रति समर्पण को देखते हुए पटेल ने बाबा साहेब को सबसे अच्छी फसल देने वाला बीज कहा था। कई सदस्य, कई समितियां, कई संशोधन, कई सुझाव और कई देशों के विचारों के बाद केवल बीएन राव के प्रयासों पर जिन्ना ने पानी फेर दिया जब जिन्ना ने दो दो संविधान लिखने पर अड़ गए। एक पाकिस्तान के लिए और एक भारत के लिए।

पृथक पाकिस्तान की घोषणा के बाद पहली बार 9 दिसम्बर 1946 से भारतीय संविधान पर जमकर कार्य हुए। इस तरह डॉ अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करके दुनिया को चौंकाया। आज वो लोग संविधान बदलने की बात करते हैं जिनके पूर्वजों ने जग हंसाई करवाई थी। मसौदा तैयार करने के पश्चात आगे इसे अमलीजामा पहनाने पर कार्य हुआ जिसमें भी खूब नौटँकियां हुई .. अकेले व्यक्ति बाबा साहेब थे जिन्होंने संविधान पर मन से कार्य किये। पूरी मेहनत और लगन से आज ही के दिन पुरे 2 साल 11 माह 18 दिन बाद बाबा साहेब ने देशवासियों के सामने देश का अपना संविधान रखा जिसके दम पर आज देश विकास और शिक्षा की ओर अग्रसर बढ़ रहा है और कहने वाले कहते रहें मगर बाबा साहेब के योगदान ये भारत कभी नही भुला सकता है। हम उनको संविधान निर्माता के रूप तक सीमित नही कर सकते, आर्किटेक्ट ऑफ़ मॉडर्न इंडिया यूँ ही नही कहा गया कुछ तो जानना पड़ेगा उनके योगदान, समर्पण, कर्तव्य और संघर्षों को।

Abheya Das Deoband, 

सोमवार, 13 अगस्त 2018

एतिहासिक संदेश भारतीय सविधान रचेयता के नाम

        एतिहासिक संदेश भारतीय  सविधान रचेयता के नाम
डॉ. आंबेडकर दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने ही सब से पहले दलितों के लिए राजनैतिक अधिकारों की लडाई लड़ी थी. उन्होंने ही भारत के भावी संविधान के निर्माण के सम्बन्ध में लन्दन में 1930-32 में हुए गोलमेज़ सम्मलेन में दलितों को एक अलग अल्पसंख्यक समूह के रूप में मान्यता दिलाई थी और अन्य अल्पसंख्यकों मुस्लिम, सिख, ईसाई की तरह अलग अधिकार दिए जाने की मांग को स्वीकार करवाया था. 1932 में जब “कम्युनल अवार्ड” के अंतर्गत दलितों को भी अन्य अल्पसंख्यकों की तरह अलग मताधिकार मिला तो गाँधी जी ने उस के विरोध में यह कहते हुए कि इस से हिन्दू समाज टूट जायेगा, आमरण अनशन की धमकी दे डाली जब कि उन्हें अन्य अल्पसंख्यकों को यह अधिकार दिए जाने में कोई आपत्ति नहीं थी. अंत में अनुचित दबाव में मजबूर होकर डॉ. आंबेडकर को गांधी जी की जान बचाने के लिए “पूना पैक्ट” करना पड़ा और दलितों के राजनैतिक स्वतंत्रता के अधिकार की बलि देनी पड़ी तथा संयुक्त चुनाव क्षेत्र और आरक्षित सीटें स्वीकार करनी पड़ीं.
गोलमेज़ कांफ्रेंस में लिए गए निर्णय के अनुसार नया कानून “गवर्नमेंट आफ इंडिया 1935 एक्ट” 1936 में लागू हुआ. इस के अंतर्गत 1937 में पहला चुनाव कराने की घोषणा की गयी. इस चुनाव में भाग लेने के लिए डॉ. आंबेडकर ने अगस्त 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (स्वतंत्र मजदूर पार्टी) की स्थापना की और बम्बई प्रेज़ीडैन्सी में 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 15 सीटें जीतीं. इस के बाद उन्होंने 19 जुलाई, 1942 को आल इंडिया शैडयूल्ड कास्टस फेडरेशन बनायी. इस पार्टी से उन्होंने 1946 और 1952 में चुनाव लड़े परन्तु इस में पूना पैकट के दुशप्रभाव के कारण उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली. फलस्वरूप 1952 और 1954 के चुनाव में डॉ. आंबेडकर स्वयं हार गए. अंत में उन्होंने 14 अक्तूबर, 1956 को नागपुर में आल इंडिया शैडयूल्ड कास्टस फेडरेशन को भंग करके रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) नाम से नयी पार्टी बनाने की घोषणा की. इस के लिए उन्होंने इस पार्टी का संविधान भी बनाया. वास्तव में यह पार्टी उन के परिनिर्वाण के बाद 3 अक्तूबर, 1957 को अस्तित्व में आई. इस विवरण के अनुसार बाबा साहेब ने अपने जीवन काल में तीन राजनैतिक पार्टियाँ बनायीं. इन में से वर्तमान में आरपीआई अलग अलग गुटों के रूप में मौजूद है.
वर्तमान संद्धर्भ में यह देखना ज़रूरी है कि बाबा साहेब ने जिन राजनैतिक पार्टियों के माध्यम से राजनीति की क्या वह जाति की राजनीति थी या विभिन्न वर्गों के मुद्दों की राजनीति थी. इस के लिए उन द्वारा स्थापित पार्टियों के एजंडा का विश्लेषण ज़रूरी है.
आइए सब से पहले बाबा साहेब की स्वतंत्र मजदूर पार्टीको देखें. डॉ. आंबेडकर ने अपने ब्यान में पार्टी के बनाने के कारणों और उसके काम के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा था- “इस बात को ध्यान में रखते हुए कि आज पार्टियों को सम्प्रदाय के आधार पर संगठित करने का समय नहीं है, मैंने अपने मित्रों की इच्छाओं से सहमति रखते हुए पार्टी का नाम तथा इस के प्रोग्राम को विशाल बना दिया है ताकि अन्य वर्ग के लोगों के साथ राजनीतिक सहयोग संभव हो सके. पार्टी का मुख्य केंद्रबिंदु तो दलित जातियों के 15 सदस्य ही रहेंगे परन्तु अन्य वर्ग के लोग भी पार्टी में शामिल हो सकेंगे.”
पार्टी के मैनीफिस्टो में भूमिहीन, गरीब किसानों और पट्टेदारों और मजदूरों की ज़रूरतों और समस्याओं का निवारण, पुराने उद्योगों की पुनर्स्थापना और नए उद्योगों की स्थापना, छोटी जोतों की चकबंदी, तकनीकी शिक्षा का विस्तार, उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण, भूमि के पट्टेदारों का ज़मीदारों द्वारा शोषण और बेदखली, औद्योगिक मजदूरों के संरक्षण के लिए कानून, सभी प्रकार की कट्टरपंथी और प्रतिक्रियावाद  को दण्डित करने, दान में मिले पैसे से शिक्षा प्रसार, गाँव के नजरिये को आधुनिक बनाने के लिए सफाई और मकानों का नियोजन और गाँव के लिए हाल, पुस्तकालय और सिनेमा घर आदि का प्रावधान करना था.
पार्टी ने मुख्यतया किसानों और गरीब मजदूरों के कल्याण पर बल दिया था. पार्टी की कोशिश लोगों को लोकतंत्र के तरीकों से शिक्षित करना, उन के सामने सही विचारधारा रखना और उन्हें कानून द्वारा राजनीतिक कार्रवाही के लिए संगठित करना आदि थी. इस से स्पष्ट है इस पार्टी की राजनीति जातिवादी न होकर वर्ग और मुद्दा आधारित थी और इस के केंद्र में मुख्यतया दलित थे. यह पार्टी बम्बई विधान सभा में सत्ताधारी कांग्रेस की विपक्षी पार्टी थी. इस पार्टी ने अपने कार्यकाल में बहुत जनोपयोगी कानून बनवाये थे. इस पार्टी के विरोध के कारण ही फैक्टरियों में हड़ताल पर रोक लगाने सम्बन्धी औद्योगिक विवाद बिल पास नहीं हो सका था.
अब बाबा साहेब द्वारा स्थापित 1942 में स्थापित आल इंडिया शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के उद्देश्य और एजंडा को देखा जाये. डॉ. आंबेडकर ने इसे सत्ताधारी कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टियों के बीच संतुलन बनाने के लिए तीसरी पार्टी के रूप में स्थापित करने की बात कही थी.
पार्टी के मैनिफिस्टो में कुछ मुख्य मुद्दे थे: सभी भारतीय समानता के अधिकारी हैं, सभी भारतियों के लिए धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक समानता की पक्षधरता; सभी भारतियों को अभाव और भय से मुक्त रखना राज्य की जिम्मेवारी है,  स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का संरक्षण; आदमी का आदमी द्वारा, वर्ग का वर्ग द्वारा तथा राष्ट्र का राष्ट्र द्वारा उत्पीड़न और शोषण से मुक्ति और सरकार की संसदीय व्यवस्था का संरक्षण, आर्थिक प्रोग्राम के अंतर्गत बीमा का राष्ट्रीयकरण और सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य बीमा योजना और नशेबंदी का निषेध था. यद्यपि यह पार्टी पूना पैक्ट के कारण शक्तिशाली कांग्रेस के सामने चुनाव में कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सकी परन्तु पार्टी के एजंडे और जन आंदोलन जैसे भूमि आन्दोलन आदि के कारण अछूत एक राजनीतिक झंडे के तल्ले जमा होने लगे जिस से उन में आत्मविश्वास बढ़ने लगा. फेडरेशन के प्रोग्राम से स्पष्ट है कि यदपि इस पार्टी के केंद्र में दलित थे परन्तु पार्टी जाति की राजनीति की जगह मुद्दों पर राजनीति करती थी और का फलक व्यापक था.
जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि बाबा साहेब ने बदलती परिस्थितियों और लोगों की ज़रुरत को ध्यान में रख कर एक नयी राजनीतिक पार्टी “रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया” की स्थापना की घोषणा 14 अक्तूबर, 1956 को की थी और इस का संविधान भी उन्होंने ही बनाया था. इस पार्टी को बनाने के पीछे उन का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी पार्टी बनाना था जो संविधान में किये गए वादों के अनुसार हो और उन्हें पूरा करना उस का उद्देश्य हो. वे इसे केवल अछूतों की पार्टी नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि एक जाति या वर्ग के नाम पर बनायी गयी पार्टी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकती. वह केवल दबाव डालने वाला ग्रुप ही बन सकती है. आरपीआई की स्थापना के पीछे मुख्य ध्येय थे: (1)समाज व्यवस्था से विषमतायें हटाई जाएँ ताकि कोई विशेषाधिकार प्राप्त तथा वंचित वर्ग न रहे, (2) दो पार्टी सिस्टम हो एक सत्ता में दूसरा विरोधी पक्ष, (3) कानून के सामने समानता और सब के लिए एक जैसा कानून हो, (4) समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना, (5) अल्पसंख्यक लोगों के साथ सामान व्यवहार, (6) मानवता की भावना जिस का भारतीय समाज में अभाव रहा है.
पार्टी के संविधान की प्रस्तावना में पार्टी का मुख्य लक्ष्य व उद्देश्य “ न्याय, स्वतंत्रता, समता व बंधुता” को प्राप्त करना था. पार्टी का कार्यक्रम बहुत व्यापक था. पार्टी की स्थापना के पीछे बाबा साहेब का उद्देश्य था कि अल्पसंख्यक लोग, गरीब मुस्लिम, गरीब ईसाई, गरीब तथा निचली जाति के सिक्ख तथा कमज़ोर वर्ग के अछूत, पिछड़ी जातियों के लोग, आदिम जातियों के लोग, शोषण का अंत, न्याय और प्रगति चाहने वाले सभी लोग एक झंडे के तल्ले संगठित हो सकें और पूंजीपतियों के मुकाबले में खड़े होकर संविधान तथा अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें.
(दलित राजनीति और संगठन - भगवान दास)
आरपीआई की विधिवत स्थापना बाबा साहेब के परिनिर्वाण के बाद 1957 में हुयी और पार्टी ने नए एजंडे के साथ 1957 व 1962 का चुनाव लड़ा. पार्टी को महाराष्ट्र के इलावा देश के अन्य हिस्सों में भी अच्छी सफलता मिली. शुरू में पार्टी ने ज़मीन  के बंटवारे, नौकरियों में आरक्षण, न्यूनतम मजदूरी, दलितों से बौद्ध बने लोगों लिए आरक्षण आदि के लिए संघर्ष किया. पार्टी में मुसलमान, सिक्ख और जैन आदि धर्मों के लोग शामिल हुए. उनमें पंजाब के जनरल राजिंदर सिंह स्पैरो, दिल्ली में डॉ. अब्बास मलिक, उत्तर प्रदेश में राहत मोलाई, डॉ. छेदी लाल साथी, नासिर अहमद, बंगाल में श्री एस. एच. घोष आदि प्रसिद्ध व्यक्ति और कार्यकर्ता हुए. 1964 में 6 दिसंबर से फरवरी 1965 तक पार्टी ने स्वतंत्र भारत में ज़मीन के मुद्दे को लेकर पहला जेल भरो आन्दोलन चलाया जिस में तीन लाख से अधिक दलित जेल गए. सरकार को मजबूर हो कर भूमि आबंटन और कुछ अन्य मांगें माननी पड़ीं.
इस दौर में आरपीआई दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की एक मज़बूत पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई. परन्तु 1962 के बाद यह पार्टी टूटने लगी. इस का मुख्य कारण था कि इस पार्टी से उस समय की सब से मज़बूत राजनैतिक पार्टी कांग्रेस को महाराष्ट्र में खतरा पैदा हो रहा था. इस पार्टी की एक बड़ी कमजोरी थी कि इसकी सदस्यता केवल महारों तक ही सीमित थी. कांग्रेस के नेताओं ने इस पार्टी के नेताओं की कमजोरियों का फायदा उठा कर पार्टी में तोड़फोड़ शुरू कर दी. सब से पहले उन्होंने पार्टी के सब से शक्तिशाली नेता दादा साहेब गायकवाड़ को पटाया और उन्हें राज्य सभा का सदस्य बना दिया. इस पर पार्टी दो गुटों में बंट गयी: गायकवाड़ का एक गुट कांग्रेस के साथ और दूसरा बी.डी. खोब्रागडे गुट विरोध में. इस के बाद अलग नेताओं के नाम पर अलग गुट बनते गए और वर्तमान में यह कई गुटों में बंट कर बेअसर हो चुकी है. इन गुटों के नेता रिपब्लिकन नाम का इस्तेमाल तो करते हैं परन्तु उन का इस पार्टी के मूल एजंडे से कुछ भी लेना देना नहीं है. वे अपने अपने फायदे के लिए अलग पार्टियों से समझौते करते हैं और यदाकदा लाभ भी उठाते हैं.
आरपीआई के पतन के बाद उत्तर भारत में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के नाम से एक पार्टी उभरी जिस ने बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने का वादा किया. शुरू में इस पार्टी को कोई ख़ास सफलता नहीं मिली. बाद में 1993 में उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों की समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ मिल कर चुनाव लड़ने से इस पार्टी को अच्छी सीटें मिलीं  और एक सम्मिलित सरकार बनी. परन्तु कुछ व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण जल्दी ही इसका पतन हो गया. इस पार्टी की नेता मायावती ने  सत्ता पाने के लालच में दलितों की घोर विरोधी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से समझौता करके मुख्य मंत्री की कुर्सी हथिया ली परन्तु बाबा साहेब के मिशन और सिद्धांतों को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी. इस के बाद पार्टी ने दो बार फिर भाजपा से गठबंधन किया और सत्ता सुख भोगा और अब अपने पतन की ओर अग्रसर है. इस पार्टी ने अवसरवादी, ब्राह्मणवादी, माफिययों और पूंजीपति तत्वों को पार्टी में शामिल करके दलितों को मायूस किया और उन्हें राज्य से मिलने वाले कल्याणकारी लाभों से वंचित कर दिया. इस के नेतृत्व के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार, तानाशाही और अदूरदर्शिता से बाबा साहेब के नाम पर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की बनी एकता छिन्न- भिन्न हो गयी है. आज दलितों का एक बड़ा हिस्सा इस पार्टी से टूट कर हिन्दुत्ववादी भाजपा के साथ चला गया है. दलितों की एक प्रमुख जाति चमार/जाटव को छोड़ कर दलितों की शेष उपजातियां अधिकतर भाजपा की तरफ चली गयी हैं. भाजपा इन जातियों का इस्तेमाल दलितों और मुसलामानों के बीच टकराव करवाने के लिए कर रही है. इस से हिंदुत्व मज़बूत हो रहा है और बहुसंख्यकवाद उग्र होता जा रहा है.
उपरोक्त विवेचन से एक बात बहुत स्पष्ट है कि डॉ. आंबेडकर जाति की राजनीति के कतई पक्षधर नहीं थे क्योंकि इस से जाति मजबूत होती है. इस से हिंदुत्व मजबूत होता है जो कि जाति व्यवस्था की उपज है. डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य तो जाति का विनाश करके भारत में जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था. डॉ. आंबेडकर ने जो भी राजनैतिक पार्टियाँ बनायीं वे जातिगत पार्टियाँ नहीं थीं क्योंकि उन के लक्ष्य और उद्देश्य व्यापक थे. यह बात सही है कि उनके केंद्र में दलित थे परन्तु उन के कार्यक्रम व्यापक और जाति निरपेक्ष थे. वे सभी कमज़ोर वर्गों के उत्थान के लिए थे. इसी लिए जब तक उन द्वारा स्थापित की गयी पार्टी आरपीआई उन के सिद्धांतों और एजंडा पर चलती रही तब तक वह दलितों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने में सफल रही. जब तक उन में आन्तरिक लोकतंत्र रहा और वे जन मुद्दों को लेकर संघर्ष करती रही तब तक वह फलती फूलती रही. जैसे ही वह व्यक्तिवादी और जातिवादी राजनीति के चंगुल में पड़ी उसका पतन हो गया.
अतः यदि वर्तमान में विघटित दलित राजनीति को पुनर्जीवित करना है तो दलितों को जातिवादी राजनीति से निकल कर व्यापक मुद्दों की राजनीति को अपनाना होगा. जाति के नाम पर राजनीति करके व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि करने वाले नेताओं से मुक्त होना होगा. उन्हें यह जानना चाहिए कि जाति की राजनीति जाति के नायकों की व्यक्ति पूजा को मान्यता देती है और तानाशाही को बढ़ावा देती है. जाति की राजनीति में नेता प्रमुख हो जाते हैं और मुद्दे गौण. अब तक के अनुभव से यह सिद्ध हो चुका है कि जाति की राजनीति से जाति टकराव और जाति स्पर्धा बढ़ती है जो कि जातियों की एकता में बाधक है. इसी के परिणामस्वरूप दलितों की कई छोटी उपजातियां बड़ी उपजातियों से प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी दुश्मन हिन्दुत्ववादी पार्टियों से जा मिली हैं जो कि दलित एकता के लिए बहुत बड़ा खतरा है. अतः इस खतरे के सम्मुख यह आवश्यक है कि दलित वर्ग अपनी राजनैतिक पार्टियों और राजनेताओं का पुनर्मूल्यांकन करे और जाति की विघटनकारी राजनीति को नकार कर जनवादी, प्रगतिशील और मुद्दा आधारित राजनीति का अनुसरण करे जैसा कि डॉ. आंबेडकर की अपेक्षा थी.

दरअसल अब देश को जातिवादी पार्टियों की ज़रूरत नहीं बल्कि सब के सहयोग से जाति-व्यवस्था विरोधी एक मोर्चे की ज़रुरत हैअन्यथा जातियां मज़बूत होती रहेंगी जिस से धर्म की राजनीति को पोषण मिलता रहेगा जो वर्तमान में लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा खतरा है.     Abheya Das Deoband 

शनिवार, 11 अगस्त 2018

मायावती की जीवनी

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मायावती की जीवनी लिखने वाले अजॉय बोस लिखतें है की 'कांशीराम, मायावती के साथ बहुत अच्छा भावनात्मक जुड़ाव रखते थे. कांशीराम का गुस्सैल स्वभाव, खरी-खरी भाषा व जरूरत पड़ने पर हाथ के इस्तेमाल पर मायावती की तर्कपूर्ण खरी-खरी बातें भारी पड़ती थी. समान आक्रामक स्वभाव वाले दलित चेतना के लिए समर्पित इन दोनों लोगो के काम का अंदाज़ जुदा होते हुए भी एक दुसरे का पूरक था, जहां कांशीराम लोगो से घुलना मिलना, राजनैतिक संघर्ष और गपशप में यकीन रखते थे वही मायावती अंतर्मुखी रहते हुए राजनैतिक बहसों को समय की बर्बादी मानती थीं. मायावती का ये अंदाज़ अब भी बरकरार है. वे आज भी चुपचाप अपना काम करती हैं. राजनैतिक अटकलबाजियों में ना तो वो खुद शामिल होती हैं ना ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को शामिल होने देती हैं. अस्सी के दशक में जब वे आम अध्यापिका थीं तब भी वे अपनी शख्सियत के मुताबिक़ पूछा करती थी "अगर हम हरिजन की औलाद है तो क्या गांधी शैतान की औलाद थे." अपने इसी तेज तर्रारी व खरी तेजाबी जुबान से ,जब उन्होंने वर्णवादी व्यवस्था को मनुवादी कह कह कर हिंदी क्षेत्रों में लताड़ना शुरू किया तो वर्षो से दबे हुए दलित समाज ने उन्हें अपनी आवाज़ और अपने लिए युद्धरत एक सिपाही को मायावती के रूप में पाया. कांग्रेस में वोटबैंक की मानिंद सिमटे रहने वाले दलित अधिकारी नेता अब आज़ाद महसूस करने लगे और अस्सी के दशक का 'हरिजन' कब राजनैतिक व्यक्तित्व को प्राप्त कर 'दलित' बन गया ये पता ही नहीं चला. मायावती को समझने के लिए उनकी आत्मकथा
'मेरा संघर्षमय जीवन एवं बहुजन समाज मूवमेंट का सफरनामा'
 के पन्ने पलटने होंगे. हर चेतना संपन्न दलित की तरह मायावती में भी दलित आंदोलन की पहली समझ बाबा साहब डा. अंबेडकर की जीवनी और उनकी किताबें पढ़कर आई. इन किताबों से मायावती का पहला परिचय उनके पिता ने कराया. मायावती अपनी आत्मकथा में लिखती हैं, 'तब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती थी. एक दिन मैने पिताजी से पूछा कि अगर मैं भी डा.अंबेडकर जैसे काम करूं तो क्या वे मेरी भी पुण्यतिथि बाबा साहब की तरह ही मनाएंगे?' मायावती के विरोधी भले ही उनको लेकर मनगढ़ंत कहानियां गढ़ते फिरें और उन पर तानाशाही का आरोप लगाते रहें, मायावती का राजनीतिक जीवन इतना आसान नहीं रहा है. मायावती पहले बामसेफ और फिर डीएस फोर में सक्रिय हुईं. दोनों संगठनों की स्थापना क्रमश: 1978 और 1981 में हुई थी. उस समय इन संगठनों से मायावती का जुड़ाव यह साबित करता है कि सत्ता उनका साध्य नहीं थी. वह खुद तय किए उद्देश्य के लिए लड़ रही थीं. यह वह समय था जब दलित आंदोलन का कोई भविष्य नहीं दिखता था, कोई मानने को तैयार नहीं था कि बहुजन आंदोलन कभी सफल भी होगा. मायावती जी आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष किया है. निजी जिंदगी में परिवार के स्तर पर भी उन्होंने बहुत तकलीफें सही. 1984 में बहुजन समाज पार्टी बनने पर ही मायावती सक्रिय राजनीति में उतरीं, लेकिन पिता उनके राजनीति में जाने के विरोधी थे. पिता ने कहा कि अगर कांशीराम का साथ नहीं छोड़ा तो उन्हें परिवार से अलग कर दिया जाएगा. अपनी आत्मकथा में मायावती लिखती हैं, 'पिता जानते थे लड़की घर छोड़कर नहीं जा सकती. उन्होंने मुझ पर दबाव बनाया, लेकिन मैंने उनकी नहीं सुनी.' इसके बाद मायावती ने घर छोड़ दिया. उनका साथ दिया बड़े भाई ने. पास में था तो बस सात साल की नौकरी से बचा कुछ पैसा. वह कहती हैं कि 'मैं भाई के साथ अलग कमरा लेकर रहती थी. कमरा कांशीराम जी ने दिलवाया था. जल्दी ही लोगों ने दुष्प्रचार शुरू कर दिया.' खुद कांशीराम ने भी लिखा है कि राजनीति में प्रवेश करते ही मायावती की बेहिसाब मुश्किलें शुरू हो गईं.' अपनी पहली राजनीतिक जीत के लिए उन्हें कई साल का इंतजार करना पड़ा. 1984 में बसपा के गठन के बाद से ही मायावती ने कैराना से चुनावी सफ़र शुरू किया. इस मुकाबले में जीत तो कांग्रेस प्रत्याशी की हुई, पर मायावती ने भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई. इस चुनाव में मायावती ने 44,445 वोटों के साथ तीसरा स्थान प्राप्त किया. फिर आया 1985 बिजनौर का उपचुनाव. इस चुनाव में वह 61,504 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं. मायावती को चाहने वालों की तादाद बढ़ रही थी और साथ ही वोटों की संख्या भी. 1987 में हरिद्वार सीट से 1,25,399 वोटों के साथ वह दूसरे स्थान पर रही. 1988 के महत्वपूर्ण इलाहाबाद की लोकसभा सीट के उपचुनाव में वी पी सिंह व कांग्रेस के अनिल शास्त्री के एतिहासिक मुकाबले में तीसरी बड़ी दावेदारी कांशीराम के नेतृत्व में इसी बहुजन समाज पार्टी ने पेश किया. इतने प्रयासों के बाद सन् 1989 में बिजनौर से 1,83,189 वोटों के साथ वे पहली बार संसद के लिए चुन ली गई. 1984 में 'बीएसपी की क्या पहचान, नीला झंडा-हाथी निशान'

 व बाबा तेरा मिशन अधूरा मायावती करेंगी पूरा,
 के नारों के साथ बसपा ने 1993 में सपा (पिछड़े मुस्लिम) व बसपा (अति पीछड़े व दलित) गठबंधन कर, 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम' का नारा दिया. लगा भाजपा के पूरे राम मंदिर आंदोलन को धुल चटा सवर्णों के धर्म व राजनैतिक आंदोलन की रीढ़ ही तोड़ दी गई है. कांशीराम की तरह वे उत्तर प्रदेश से बाहर की नहीं थी. वे यूपी की बेटी थी, वे दलित की बेटी थी. मायावती की इसी ज़मीनी पकड़ और आक्रामकता के चलते 1989 में बसपा महज दो लोकसभा सीटो पर 9.93 फीसदी मत से बढ़कर 1999 आते आते 14 सीट और 22.8 फीसदी मतों पर पहुंच गई. 1995 में भाजपा के साथ हाथ मिला दलित की ये बेटी पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बन गई. इस देश के अलावा देश के बाहर के लोगों के लिए भी एक अचंभे की बात थी. यह वह वक्त था, जब मायावती विश्व के फलक पर अचानक एक कद्दावर नेता के रूप में उभरी थी. उनकी इन्हीं उपलब्धियों की बदौलत प्रतिष्ठित 'न्यूज वीक' पत्रिका उन्हें दुनिया की आठ सर्वाधिक ताकतवर महिलाओं में शुमार कर चुकी हैं. मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद उन्होंने बहुजन नायकों और बहुजन हितों पर खासा ध्यान दिया. मायावती ने अम्बेडकर ग्राम योजना लाकर अनुसूचित जाति बहुल गांव में सरकारी निवेश को बढ़ा दिया. थानों में दलित अधिकारियों की नियुक्ति कर दलित उत्पीडन पर रोक लगा दी व दलित महापुरुषों के नाम पर नए जिले घोषित कर दलितों को मोह लिया. तब से ही दलितों के साथ ही पछड़े वर्ग में भी मायावती का खासा प्रभाव रहा. सी एस डी एस की रिपोर्ट को माने तो सन 1996 में बसपा को 27% कुर्मी, 24.7% कोईरी वोट मिले. समाजवादी पार्टी तो मायावती और बसपा के बढ़ते कदम से इतनी बौखला गई कि उसके लोगों ने मायावती पर हमला तक कर दिया. मुलायम की पार्टी के कुछ लोगों द्वारा गेस्ट हॉउस में मायावती के ऊपर किये गए जानलेवा हमले में सवर्ण नेताओं खासकर ब्रह्मदत्त द्विवेदी द्वारा बचाई गई मायावती ने सन् 2005 में बसपा में ही सवर्ण नेतृत्व उभारना शुरू कर दिया. इसको वकील से यूपी के महाधिवक्ता बनाये गए सतीश चन्द्र मिश्र ने मूर्त रूप दे डाला. मायावती ने सवर्ण और ब्राह्मण नेताओं को ज्यादा महत्त्व देना ,कांशीराम द्वारा बनाया गया 15 बनाम 85 फीसदी का बहुजन सामाजिक समीकरण को 25% दलित, 9% ब्राह्मण+20% अति पिछड़ों का समीकरण कर दिया. कांग्रेस के जाते ही जो ब्राह्मण नेतृत्व विहीन हो गए थे वे सतीशचंद्र के नेतृत्व में 2007 में बड़ी संख्या में बसपा से जुड़े, यहां तक कि 42 ब्राह्मण जीतकर बसपा की पहली बार बनी पूर्ण बहुमत सरकार का हिस्सा बने. यह सब मायावती की बेहतरीन राजनीतिक सूझ-बूझ का ही नतीजा था. उनके विरोधी भले ही कुछ भी कहें, लेकिन ताज एक्सप्रेस वे और बुद्ध इंटरनेशनल सर्किल मायावती के मुख्यमंत्रित्वकाल की ऐसी उपलब्धि है, जिसके बारे में उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी सोच भी नहीं सकते थे. वरिष्ठ लेखिका अरुणधति राय भी विरोधियों के इसी कुप्रचार का शिकार थीं. लेकिन नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किल पर देखने के बाद अपने एक संस्मरण में उन्होंने मायावती की तारीफ के पुल बांधे थे. प्रशासक के रूप में 'बहन जी' का तेवर हमेशा उग्र रहा है और उन्होंने समझौता नहीं किया. उत्तर प्रदेश के एक बड़े किसान नेता महेन्द्रसिंह टिकैत द्वारा एक जन सभा में जिसमें, अजीत सिह भी मौजूद थे, मायावती को गालियां दी गई. बहन जी ने टिकैत की गिरफ्तारी का आदेश दिया. टिकैत बिजनौर से मजबूत आधार वाले अपने गांव सिसौली (मुजफ्फर नगर) लौट आया. गांव की घेराबन्दी कर दी गई. पानी बिजली काट दी गई. अंत में बड़बोला टिकैत अपनी औकात में आ गया. उसने गिड़गिडा़ते हुए मुख्यमंत्री मायावती से माफी मांगी और उसको गिरफ्तार कर लिया गया. वहीं मुलायम राज को पटखनी देकर तब सत्ता में पहुंची मायावती ने यूपी के बड़े-बड़े गुंडों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. कई अंडरग्राउंड हो गए . सख्त प्रशासन के लिए विपक्षी भी उनका लोहा मानते हैं. चाहे किसी जाति या धर्म का व्यक्ति हो, प्रदेश की आम जनता ने बसपा शासन में हमेशा सुरक्षित महसूस किया. खासकर महिलाओं ने एक महिला मुख्यमंत्री के प्रसाशन को काफी पसंद किया. 'चढ़ गुंडो की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर' जैसे नारे एक वक्त उत्तर प्रदेश की फिजाओं में खूब गूंजे थे. मायावती ने हमेशा से अपनी कड़क छवि के अनुरूप ही काम किया. बहुजन नायकों के सम्मान को लेकर भी मायावती हमेशा सचेत रहीं. यह तब देखने को मिला जब 2007 में उन्होंने लखनऊ के अंबेडकर स्मारक के रख रखाव में कोताही बरतने के कारण कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया. मायावती का पूरा ध्यान दलितों के हित साधने में रहा. उनके द्वारा बैकलाग की भर्तियों पर बार-बार पूछताछ जारी रही. दलित कोटे को पूरा करना और महत्वपूर्ण पदों पर उन्हीं के लोगों की तैनाती इस बात को दर्शाती भी रही. अपने राजनीतिक गुरु, सचेतक और बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी के गुजरने के बाद मायावती को झटका लगा. लेकिन तब तक वे परिपक्व हो चुकी थीं. एक वक्त ऐसा भी आया जब कई बड़े नामों ने बसपा का साथ छोड़ दिया. इनमें बसपा को कई साल देने वाले सलेमपुर के पूर्व सांसद बब्बन राजभर हो, बलिया से ही कांशीराम के साथी पूर्व सांसद बलिहारी बाबू हो, इलाहबाद से इंडियन जस्टिस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष कालीचरण सोनकर हो या फिर आजमगढ़ के सगड़ी के नेता मल्लिक मसूद तमाम लोग पार्टी से अलग हो गए. इसमें से कई आज कांग्रेस की शोभा बढ़ा रहे है. लेकिन कुछ ऐसे लोग भी रहें तो 'बहन जी' के पीछे साए की तरह खड़े रहें. इनमें कांशीराम के सेक्रेट्री अम्बेथ राजन व पार्टी के बिहार प्रभारी गांधी आज़ाद जैसे प्रतिबद्ध दलित कार्यकर्ता रहे हैं. अम्बेथ राजन का संगठन कांशीराम व अन्य दलितों को दिल्ली में मूलभूत सुविधाएं देता था. आज भी वे उसी प्रकार की सेवाएं बसपा का खजांची बन कर दे रहे हैं. मायावती के जीवन संघर्ष पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. विवेक कुमार ने पिछले दिनों अपने एक लेख में लिखा था, 'यह विडंबना है कि लोग आज मायावती के गहने देखते हैं, उनका लंबा संघर्ष और एक-एक कार्यकर्ता तक जाने की मेहनत नहीं देखते. वे यह जानना ही नहीं चाहते कि संगठन खड़ा करने के लिए मायावती कितना पैदल चलीं, कितने दिन-रात उन्होंने दलित बस्तियों में काटे. मीडिया इस तथ्य से आंखें मूंदे है. जाति और मजहब की बेड़ियां तोड़ते हुए मायावती ने अपनी पकड़ समाज के हर वर्ग में बनाई है. वह उत्तर प्रदेश की पहली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने नौकरशाहों को बताया कि वे मालिक नहीं, जनसेवक हैं. अब सर्वजन का नारा देकर उन्होंने बहुजन के मन में अपना पहला दलित प्रधानमंत्री देखने की इच्छा बढ़ा दी है. दलित आंदोलन और समाज अब मायावती में अपना चेहरा देख रहा है. भारतीय लोकतंत्र को समाज की सबसे पिछली कतार से निकली एक बहुजन महिला की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए l मायावती एक जांबाज लीडर हे अपने समाज के लिए अगर कोई कुछ कर सकता हे तोसिर्फ आयरन लेडी बहन मायावती हे /अभय दास  deoband -